संदेश
फिर कविता के आँसू निकले - कविता - राघवेंद्र सिंह
प्रश्न अधूरे रहे अकिंचित, पृष्ठ वो सूने-सूने पिघले। स्याही को आभास हुआ तब, फिर कविता के आँसू निकले। सोच रही है अंतिम कविता, क्या मेरा …
मैं बच सकता था - कविता - सुरेन्द्र जिन्सी
मैं बच सकता था अगर मैंने कविताएँ कम पढ़ी होतीं। अगर मैं बस एक आदमी होता— जिसे गेहूँ के भाव पता होते, जो प्रेमिका की आँखों में क्रांति …
लेकिन अब नहीं - लघुकथा - डॉ॰ राम प्रमोद मिश्र
सुबह-सुबह रमावती के ढाबे पर चाय पीने वाले जमा हो जाते थे। चाय के साथ साथ उन्हें नाश्ते में उबले चने की मसालेदार घुघुनी मिल जाती थी। दु…
डिग्रियों के बोझ तले दम घुटता - कविता - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
डिग्रियों के बोझ तले सपनों का दम घुटता जाता, रोज़गार के सूने पथ पर युवा मन क्यों छटपटाता। भीड़ भरे इस दौर में प्रतिभा मौन खड़ी रोती है…
टेक्निकल बच्चे और मैनुअल बाप - कविता - मदन लाल राज
मैं जिस पीढ़ी में पैदा हुआ, बेटा बाप से सीखता भी था। बाप बार-बार सिखाता था और साथ में रीझता भी था। आजकल का बाप बेटों से मजबूरी में तकन…
प्रतीक्षा - कविता - फैजान अहमद खान
कितना कठिन है प्रतीक्षा करना, राह देखते-देखते थक जाना, फिर मिलने की उम्मीद करना और इसी उम्मीद में पागल हो जाना। ओ मेरे अबोध साथी! कभी …
सभी हैं - कविता - हेमन्त कुमार शर्मा
सभी हैं, कोई भी नहीं। बेकरारी, बेचैनी, कैसे कैसे इंतज़ारी के दुख, फिर से शून्य है, और अंक कोई भी नहीं, सभी हैं, कोई भी नहीं। इस बादल का…
कोरे पन्नों का विवेक - कविता - सतीश धर
मैं कोरे पन्नों पर लिखी जाने वाली कविताओं के बारे में सोच रहा हूँ क्यों नहीं लिखी गईं आज तक इन पन्नों पर कविताएँ। भीड़ में सबसे आगे चि…
अधूरे प्रश्न - कविता - निखिल पाण्डेय श्रावण्य
कितने ऊँचे होने पर भी दिखती हैं मिट्टी और कितने नीचे होने पर भी दिखता हैं असमान? कितने धीरे भागने से हारा जाता है और कितने तेज़ भागने …
मुँह मोड़ न जाना - गीत - सुशील कुमार
कसमें खाकर, कसम धराकर, कसमों को फिर तोड़ न जाना, पास बुलाकर, मन बहलाकर, मुझसे फिर मुँह मोड़ न जाना। वर्षों का ये रिश्ता अपना। चुन चुन …
टूटे पंख - कविता - नंदनी खरे 'प्रियतमा'
एक चिरैया थी बाग़ों में, अभी तो उड़ना सीख रही थी। अपने कोमल कोमल स्वर में, अभी कुहुकना सीख रही थी। उड़ने को कोशिश में चिड़िया, सारा दिन…
मातृभाषा - कविता - सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
मातृभाषा होती है माँ की तरह स्नेह देने वाली। जब जाता है इंसान किसी दूर-दराज़ इलाके में नौकरी की तलाश में, तो वहाँ की भाषा वहाँ के लोग …
घावों का महागीत - कविता - गोलेन्द्र पटेल
तेरी स्मृतियों के धुँधले आँगन में मैं आज भी एक बुझते हुए दीपक की तरह टिमटिमाता हूँ मेरी उँगलियों में अब रंग नहीं बचे फिर भी मैं टूटे ह…
अश्रु सर्वथा जीते होंगे - कविता - राघवेंद्र सिंह
अश्रु सर्वथा जीते होंगे, उत्कंठित स्वर हारा होगा। प्रणत दृष्टि से जब भी हे प्रिय! तुमने हमें निहारा होगा। अश्रु सर्वथा जीते होंगे, उत्…
तुम भोगी अश्रु के - कविता - साई अनमोल
धूलि में अम्बर कल्पित कण में काया का मोल, भिक्षुक से इस जीवन में अश्रु अपने अनमोल! इनमें जीवन प्रतिबिम्बित इनसे क्यों खेलो खेल? खारेपन…
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