संजय राजभर "समित" - वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
इंतज़ार - कविता - संजय राजभर "समित"
शनिवार, अक्टूबर 31, 2020
गजब की छुअन थी
रोमांचित था तन-मन,
हया आँखों में थी
आग दोनों तरफ थी।
चुप्पी थी
फिर भर न जाने क्यूँ
हम दोनों रुके थे
इंतज़ार था
दोनों तरफ से
बड़ी मासूमियत से घुटनों के बल
इजहार का।
वो चली गयी धीरे-धीरे
वो पलटकर मुझसे लिपटना चाहती थी।
कुछ सुनकर
आइ लव यू
पर मैं ...
चेतनाशून्य ...
कुछ बोल न सका,
पता नहीं क्या हो गया था !
शायद सबसे बड़ी गलती थी।
आज मेरा भरा परिवार है
फिर भी न जाने क्यूँ?
आज भी उसका इंतज़ार है।
काश् एक बार
इजहार कर लिया होता।
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