आशीष कुमार पाण्डेय - कानपुर (उत्तर प्रदेश)
शांति रंग - कविता - आशीष कुमार पाण्डेय
गुरुवार, अक्टूबर 08, 2020
तिरंगे से शांति रंग को, चुराने वाले है कहाँ?
हरियाली ने दम तोडा, फिर क्रांति ज्वाला है कहाँ?
छोटी - छोटी बातो पर जो, सडको पर आ जाते है।
न्याय दूत बनकर जो अपनी, आवाज उठाते है।
हाथरस के कांड में वो, न्याय के दूत है कहाँ?
तिरंगे से शांति रंग को, चुराने वाले है कहाँ?
यही अगर हो जाता किसी नेता की, बेटी के साथ।
बिना रिपोर्ट प्रशाशन दौड़ता लेकर न्याय को अपने साथ।
अखबारों के पहले पन्ने में, छप जाते सब के वार।
ए. सी. रूम में बैठे एंकर, फिर उठाते एक आवाज।
हाथरस के कांड में, एंकरों की है आवाज कहाँ?
तिरंगे से शांति रंग को, चुराने वाले है कहाँ?
दरिंदो की दरिंदगी का, और क्या परिचय पाओगे,
छिन्न-भिन्न किया अंग को सबूत तुम क्या पाओगे।
बिलख रही है मात भवानी, नारी शक्ति पीड़ा में,
है मैफुज नही वो अपने, घर आंगन और क्रीडा में।
पूरा जीवन भय में बिता, देखो वो है कहाँ?
तिरंगे से शांति रंग को, चुराने वाले है कहाँ?
आने वाले चुनावो में, मुद्दा यही आएगा,
बेटी पढाओ बेटी बचाओ का, नारा ही आएगा।
फिर से बेटी के नाम पर, राजनीती खेली जाएगी,
दो आश्रू बहा कर वोटो की, छोली भर ली जायेगी।
उनसे केवल ये पूछो की, बिटिया का न्याय कहाँ?
तिरंगे से शांति रंग को, चुराने वाले है कहाँ?
कब तक बहु बेटी बहनों की, इज्जत लुटी जाएगी?
कब तक न्याय मांगने के लिए, मोमबत्ती जलाई जाएगी?
कब तक सत्ताधारी इसे, अपना मुद्दा बनायेंगे?
कब तक कुछ स्वान से युवक, इसे अपना शौक बतायेंगे?
मुझे बता दो इन सब को, दूर करने का कानून कहाँ?
तिरंगे से शांति रंग को, चुराने वाले है कहाँ?
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