युद्ध अभी शेष है (भाग १) - कहानी - मोहन चंद वर्मा

युद्ध में विजय होकर लौटे सम्राट की जय-जय कार होने पर सम्राट ने प्रजा से कहा, जय-जय कार केवल मेरी नहीं इन सभी सैनिको की करो। इनकी बाहदुरी के कारण ही हम सब की जीत हुई है और जशन की तैयारी करो फिर प्रजा सैनापति की जय-जय कर सैनिको की जय-जय कार करने लगी।

तभी कहीं से आवाज आई....। "कर लो जय-जय कार मना लो खुशियाँ।’’
सभी ने उस आवाज की ओर देखा तो एक वृद्ध औरत लाठी के साहरे कमर झुकाए चली आ रही थी। सभी ने उस वृद्ध औरत को प्रणाम किया सम्राट उस वृद्ध औरत को प्रणाम करते हुए बोले, ’प्रणाम माई, ’’आपने ही इस आने वाली विपदा के बारे में बताया और आज उस राक्षश का अंत हो गया और इस दुनिया का अंत होने से भी बचा लिया।’’ 
’’जानती हूँ बेटा मैं सब जानती हूँ आज युद्ध में विजय होकर लोटे हो मना लो खुशियाँ पर एक बात सदा याद रखना बेटा।’’
’’क्या माई..?’’
’’युद्ध कभी समाप्त नहीं होता प्रलय अभी शेष है।’’       
माई ऐसा बोलती हुई चली गई।

प्रजा हाथ जोड़े खडी थी। एक व्यक्ति ने सम्राट से पूछा, ’ सम्राट माई ऐसा क्यूँ बोलकर गई। क्या अब फिर से कोई नई आपदा आने वाली है।’   
सम्राट: हाँ.....!
सम्राट का उत्तर सुनकर प्रजा के चेहरे पर चिंता का भाव देखकर सम्राट ने कहा, ’आपदा आएगी पर अभी चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है।’ फिर कब आएगी ’’एक औरत ने पूछा?’’
सम्राट: कब क्या होगा क्या नहीं ये सब भविष्य की बाते है।
फिर माई ने इसका जिकर अभी क्यूँ किया ’’दूसरे व्यक्ति ने पूछा?’’
सम्राट: ताकि आने वाली विपदा को लेकर हम सचेत रहे। और ये बात कभी भी न भूलें की सुख के बाद दुख नहीं आता। अब आप सभी घर जाइए और आज की खुशियों की तैयारी करे।

रानी जब कक्ष में आई तो सम्राट को कक्ष में एकांत बैठा देखकर।
’’प्रजा को चिंता से मुक्त कर अब आप एकांत में किस चिंता में बैठे है?’’  
’’बस सोच रहा था आखिर माई ने ऐसा क्यूँ कहा युद्ध कभी समाप्त नहीं होता प्रलय अभी शेष है।’’  
’’आपने ही तो कहा था कब क्या होगा क्या नहीं ये सब भविष्य की बाते है। दूसरी बात आपने ये भी कहा था ये बात कभी भी न भूलें की सुख के बाद दुख नहीं आता।’’
’’ज्ञात है पर ये बात हमने प्रजा को चिंता से मुक्त करने के लिए कहा था।’’
’’जो भी हो अब आप भी इसी को आधार मान कर चिंता से मुक्त हो जाइए और बाहर जाकर देखिए। प्रजा ने कितना सुंदर आयोजन किया है।’’

आयोजन ऐसा था। मानों जैसे कोई त्योहार हो गायन नृत्य के बाद नाटक का आयोजन था। उस राक्षस का अंत कैसे हुआ उस घटना का वर्णन था।
 
युद्धभूमि में खडा एक विशालकाय राक्षस अपने सैनिको के साथ तो दूसरी तरफ सम्राट और सेनापति अपनी सैनिको के साथ। सम्राट ने राक्षस से कहा, ’ऐ राक्षस तूने अब तक जितनी की मचाई है उसके लिए हम तुम्हें क्षमा करते है। जहाँ से आया है वापस अपनी दुनिया में चला जा।’
राक्षस: मैं क्यूँ जाऊं तुम जाओं यहाँ से ऐ सम्राट इस साम्राज्य को छोडकर तू चला जा और अपनी प्रजा को भी ले जा। नहीं तो तुम सब को पैरो के तले कुचलने के बाद मैं तेरी प्रजा को खा जाऊंगा।
सम्राट: मैं एक बार फिर कहता हूँ यहाँ से चला जा नहीं तो आज तेरा अंत होगा।
राक्षस: अंत तो तुम सब का होगा उसके बाद इस धरती पर केवल राक्षस ही रहेगे। वह जोर-जोर से हसने लगा। 

सेनापति ने सम्राट से कहा, ’इस राक्षस का अंत करने के लिए हमें युद्ध करना ही होगा।’
सम्राट: कैसे इस विशाल काय राक्षस की छाती तक पहुँचकर छाती का एक बाल उखाडा जाए फिर वहीं तीर छोडा जाए?
सैनापित: एक ही योजना है। सम्राट...।
सम्राट: क्या...?
सेनापति: इसकी सेना का अंत करने के बाद इसके दोनों हाथो और पैरो को बांध देने पर ऐसा किया जा सकता है।
सम्राट: इतना आसान नहीं होगा ये करना।      
सेनापति: कुछ देर उसे बांधे रख सके तो ये असंभव भी संभव बन सकता है।

तभी उस राक्षस ने आक्रमण बोला तो उसकी सेना अस्त्र-शस्त्र के साथ भागती हुई आती है। इधर सम्राट और सेनापति ने भी आक्रमण बोला तो दोनों सेना आपस में भीडी। कुछ देर बाद राक्षस अपनी सारी सेना को मृत देखकर चिल्लाता है फिर अपने मुहं से वायु तेज गती से निकाल कर अपने मृत सैनिको को हवा में उडा कर शस्त्र की भाँति उन सब की तरफ फेंका। सेनापति ने सम्राट से कहा, ’इसने तो लाशो को ही शस्त्र बना दिया।’        
लाशे सैनिको पर जाकर गिरी कुछ सैनिक घायल हुए जो लाशो के नीचे दब गए उन्हें बाहर निकाला गया। एक लाश सैनापति की ओर आने पर सेनापति ने तलवार से उस शव के दो टुकडे कर दिए। एक लाश सम्राट के रथ पे जा लगी। रथ का पहिया टूटा तो सम्राट नीचे गिरा सेनापति रथ से उतर कर सम्राट की ओर गया उनकी तरफ आ रही लाशो का एक ढेर उन पर गिरे उससे पहले सेनापति ने सम्राट को वहाँ से हटा दिया। राक्षस ने अपने मुँह से वायु का प्रहार रोका तो सैनिको ने उसकी तरफ भाले, तीर और पत्थर के गोले फैके गए। उस पर कुछ असर नहीं हुआ तो सम्राट ने सैनिको से कहा, ’बन्धी बना लो इसे।’ फिर सेना ने मिल कर उसके पैरो को रस्सी से बांधा गया। राक्षस चल ना सका लडखडाकर नीचे गिरा सैनिक दबते-दबते बचे। फिर उसके हाथ को बांधा गया। सेनापति ने जाकर उसकी छााती से एक बाल निकाला दर्द के कारण चिल्ला उठा राक्षस के ऊपर लदे सैनिको को उठा-उठा कर फैका सेनापति को भी उठाकर फैका फिर अपने पाव की रस्सी को तोडकर वापस खडा हो गया। सम्राट ने उसकी छाती पर बान छोडा उसके लगते ही वह फिर चिल्लाकर नीचे गिर कर मर गया।
 
नाटक के समाप्त के बाद भोजन का आयोजन हुआ।

जारी... पढें अगले अंक में

मोहन चंद वर्मा - जयपुर राजस्थान

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