कपिलदेव आर्य - मण्डावा कस्बा, झुंझणूं (राजस्थान)
अच्छा नहीं - कविता - कपिलदेव आर्य
मंगलवार, नवंबर 10, 2020
दिल बहलाने के लिए, दिल तोड़ना अच्छा नहीं,
हथेली में पूनम का चाँद दिखाना, अच्छा नहीं.
डरती हैं कुछ नाजुक आँखें ख़्वाब देखने से,
नज़ारे झूठे दिखाकर, खिलखिलाना अच्छा नहीं!
ये तो मेरा दिल था, इतने सितम को झेल गया,
अब इस दिलजले को और जलाना अच्छा नहीं!
माना, कि दिल्लगी करने की तुम्हारी आदत है,
पर रिसते ज़ख़्मों पर नमक लगाना अच्छा नहीं!
इक सूरत के चक्कर में, घनचक्कर बन गए,
उस पर अदाओं की बिजली गिराना अच्छा नहीं!
एक बार की ठोकर से बिखर गई है उम्मीदे मेरी,
किसी को फिर से ठोकरों में लाना अच्छा नहीं!
जब हों गर्दिश में सितारे, तब ही प्यार होता है,
जाकर अब समझ सके हैं, इतना क्या कम है?
बड़ी मुश्किल से मिली है ज़िंदगी, ए दिले नादां,
अजी, इसे फिर ठोकरों में लाना, अच्छा नहीं!
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर