राम प्रसाद आर्य "रमेश" - जनपद, चम्पावत (उत्तराखण्ड)
आईना - कविता - राम प्रसाद आर्य "रमेश"
शुक्रवार, जनवरी 29, 2021
अरे! निर्मल ही तो हूँ मैं,
भला अब मुझे कोई क्या निर्मल करेगा।
निर्मल को निर्मला कर देने भर से भला क्या कोई तरेगा?
अरे! अबल ही तो हूँ मैं,
भला अब मुझे कोई क्या सबल करेगा।
अबल को सबल बता देने भर से भला कोई डरेगा?
अरे? प्रकाश ही तो हूँ मै,
भला अब मुझे कोई क्या दीपक दिखाएगा।
घर-घर मसाल ले घूम भी ले भला,
उर में उजाला कर लेगा?
अरे! स्वच्छ ही तो हूँ मैं,
भला अब मुझे कोई क्या स्वच्छ कर पाएगा।
सब को नहलाए गंगा, गंगा को भला कोई नहला पाएगा?
अरे! सुन्दर ही तो हूँ मैं,
भला अब मुझे कोई क्या सजाएगा।
वो असल रंग न टिका,
ये लीपा-लेपी का रंग भला टिक पाएगा?
अरे! छाया ही तो हूँ मैं,
भला अब मुझ पर कोई क्या छायेगा।
अपनों को नहीं अपना पाया,
भला गैर के साथ क्या चल पाएगा?
अरे! पढा-लिखा ही तो हूँ मैं,
भला अब कोई मुझे क्या पढ़ाएगा।
पढा-पढाकर भला, क्या भाई -भाई को लड़ाएगा?
अरे? समझदार ही तो हूँ मैं,
भला अब कोई मुझे क्या समझाएगा।
समझा-समझाकर भला,
क्या समाज से भी सम्बन्ध तुड़ाएगा?
अरे! आईना ही तो हूँ मैं,
भला अब कोई मुझसे चेहरा क्या छुपाएगा?
मुखौटा बदलता रहे भला कोई, मुख्यता को कभी बदल पाएगा?
अरे! डॉक्टर ही तो हूँ मैं,
भला अब मेरा कोई क्या इलाज करेगा।
जिसे जन्मदाता नहीं बचा पाया,
मेरे बचाने पर भला कब तक जी पाएगा?
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