महेश "अनजाना" - जमालपुर (बिहार)
प्रेरणा - कविता - महेश "अनजाना"
मंगलवार, जनवरी 19, 2021
एक योद्धा
बार बार
युद्ध हार कर
थक सा गया।
मायूस हो तम्बू में
रात्रि पहर सोचता रहा।
कैसे युद्ध को जीता जाए।
नींद आई नहीं
रात भर जागता रहा।
और सुबह हो गई।
उठने में कोई उत्साह
नज़र नहीं आया।
सोच में डूबा
योद्धा की नज़र
दीवार पर
एक चींटी पर पड़ी।
अपनी काया से बड़ी
गुड़ की धेली को लेकर
बार बार चढ़ती
और गिर पड़ती।
चींटी का प्रयास
लगातार जारी रहा।
और अन्त में
वह दीवार चढ़ गई
गुड़ की धेली लेकर।
योद्धा का हौसला
चींटी के अथक प्रयास
देख कर बढ़ा।
वह उठा
अपनी सेना के पास
पहुँचा और गरज कर बोला।
एक छोटी चींटी का हौसला
तब तक नहीं कम होता
जब तक अपने हिस्से की
गुड़ की ढेली लेकर
अपनी मांद में
पहुँच नहीं जाती।
फिर हम तो योद्धा हैं।
हमें भी जीत मिलेगी।
बस हौसला कम न हो।
चींटी की प्रेरणा ही
हमारी जीत का मंत्र है।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर