डॉ. राम कुमार झा "निकुंज" - नई दिल्ली
बीते पल नव चाह बनी है - गीत - डॉ. राम कुमार झा "निकुंज"
गुरुवार, मार्च 11, 2021
यायावर सत्पथ सेवक हम,
बीते पल की ख़बर नहीं है।
कुछ लम्हों का जीवन दुर्लभ,
साथ छोड़ने वक़्त अड़ी है।
ज़िंदगी पड़े कर्तव्य बहुत,
बाधाएँ बहु आन पड़ी है।
कँटिल उबड़ खाबड़ नद पर्वत,
दुर्गम दर्रे राह भरी हैं।
बिना रुके चलना पथ जीवन,
मंज़िल सीढ़ी विकट बनी है।
गिरते बढ़ते संघर्षी रथ,
तुंग लक्ष्य मन चाह भरी है।
बन संजीवन धीरज साहस,
आस्था सम्बल बनी पड़ी है।
पड़ रही वक़्त एकाग्र दृष्टि,
देती ऊर्जा बनी खड़ी है।
है मातृभूमि का कर्ज़ बहुत,
है समय, पर अल्प प्रगति है।
परमार्थ सदय बलिदान वतन,
नीति रीति पथ प्रीति धवल है।
है चैन कहाँ उत्थान पथिक,
करना धरती हरी भरी है।
प्रकृति वात पावक नभ जल थल,
देख प्रदूषण सिसक रही है।
झूठ कपट छल ईर्ष्या मानस,
लालच सत्ता आन पड़ी है।
आन बान सम्मान राष्ट्र पर,
द्रोही विपदा आज खड़ी है।
स्वाधीन वतन हैं स्वार्थ बहुत,
कोप अनल ईमान जली है।
महाज्वाल में जलकर निर्मल,
कीर्ति प्रगति गलहार पड़ी है।
धुन केवल पाना यश गौरव,
वक़्त साथ में जीवन गति है।
तन मन धन बस राष्ट्र भक्ति मन,
बीते पल की ख़बर नहीं है।
सीमा वतन रक्षण रनिवासर,
खुशियाँ हर जन घर लानी है।
समतुल्य प्रजा मुस्कान अधर,
शान्ति विभव इज्ज़त पानी है।
अभिलाष नवल नित आरोहण,
सच नैतिक राहें चलनी है।
मानवता मूल्यक हो जीवन,
न बीते पल सोच करनी है।
हर विघ्न नया नव चाह समझ,
बीते पल नव चाह बनी है।
मानो पतझड़ मन नवकिसलय,
पुष्प सुरभि वन महक रही है।
सोचो मत जो थे बीते पल,
निर्झर सरिता जीवन गति है।
निर्माणक नव युग संधानक,
जीता पौरुष सच पथ मति है।
हर पल जीवन औचित्य प्रबल,
नव रचना चाहें बनती हैं।
वक़्त वेग पल अनमोल रत्न,
मानक जग राहें गढ़ती हैं।
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