डॉ. ममता बनर्जी "मंजरी" - गिरिडीह (झारखण्ड)
छवि (भाग ६) - कविता - डॉ. ममता बनर्जी "मंजरी"
मंगलवार, जून 22, 2021
(६)
मानव काया मोक्ष-द्वार है, परम साधनागार भी।
जीवन दुखमय यही बनाए, करे यही उद्धार भी।।
जीवन सुख-दुख का सम्मिश्रण, धूप-छाँव का खेल है।
दीपक उतनी देर जलेगा, जितना उसमें तेल है।।
मानव जीवन पथ का राही, मंज़िल उसका लक्ष्य है।
चले झेलकर बाधाएँ जो, निश्चित वही सदक्ष है।।
लक्ष्य साधकर चलता मानव, पाने को सुख-संपदा।
यही दुःख का कारण बनकर, मानव पर हँसता सदा।
रे मूरख! यह लक्ष्य गलत है, सही लक्ष्य सद-ज्ञान है।
सद-ज्ञान लब्ध करनेवाला, पाता जग में मान है।।
तुम मानव हो, तुमपे निर्भर, यह सारा संसार है।
तुम जीते तो जीत जगत की, तुम हारे तो हार है।।
हार मानते वे ही जग में, जिनको सुख की आस हो।
लोभ-लालसा संगी बन कर, अहरह जिनके पास हो।।
माया के अधीन ये होते, खोते निज पहचान हैं।
सही राह जो इन्हें दिखाए, मानव वही महान है।।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर