संजय राजभर "समित" - वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
शब्द - कविता - संजय राजभर "समित"
गुरुवार, जुलाई 22, 2021
मैं शब्द हूँ,
दर्शन, ज्ञान, विज्ञान, योग का
संचयन और व्यक्त करने का माध्यम हूँ।
जहाँ-जहाँ जिस समूह ने
जिस-जिस रूप में रेखांकित किया,
वहाँ-वहाँ समझने योग्य,
मैं आवाज़ का
एक चिन्हित स्वरुप हूँ।
बिना हाथ पाँव के
बहुत तेज़ चलता हूँ,
हज़ारों मील दूर एक पल में
दूरसंचार से
पहुँच जाता हूँ।
कभी तीर सा
कभी दवा सा,
कभी हँसना
कभी रूठना,
कभी मंत्र
कभी श्राप,
भाँति-भाँति के मनोयोग में
समाहित हो जाता हूँ,
मैं उच्चरित हो जाता हूँ।
मैं आसमान से उतरा
अक्षरों के लड़ियों में पिरोकर
पाक-ए-क़ुरआन बना।
मैं कुरूक्षेत्र में
भगवान के मुख से निकला
तो गीता बना।
तत्वदर्शियों के विचार में बँध
समय-समय पर
देश काल के अनुरूप
मैं लोक मंत्र बना।
मैं जीव जगत का यंत्र बना।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर