प्रभात पांडे - कानपुर (उत्तर प्रदेश)
उम्मीद अभी बाक़ी है - कविता - प्रभात पांडे
सोमवार, जुलाई 19, 2021
अभी मुझे जीवन में, कुछ करना काम बाक़ी है,
अपने आलोचकों को, देना जवाब बाक़ी है।
अभी मैं अन्जान हूँ, ज़माने की नज़र में,
नाम अपना भी नग़मानिगारों में, आना बाक़ी है।
ये जो कारवाँ है बस चल पड़ा है अब,
मुद्दई ज़िक्र सारे नज़ारों में बाक़ी है।
मुझे बदनाम करना है थोड़ा शौक़ से कर लो,
तुम्हारी महफ़िलों में, मेरा ज़िक्र बाक़ी है।
लहरों से आँखें मिलाने की चाहत है मेरी,
मेहनत की कश्ती समंदर में, उतारना बाक़ी है।
न डर है मुश्किलों से, न भय है हार का,
अपने हाथों की लकीरें, बनाना बाक़ी है।
मेरे हार जाने पर ज़माने की नज़र है,
मेरी जीत का परचम लहराना बाक़ी है।
दुनिया की लम्बी दौड़ में, ये तो बस आग़ाज़ है मेरा,
उड़ने को अभी आसमान बाक़ी है।
लड़े बिना हार जाना, वो मेरी फ़ितरत में नहीं है,
टकरा जाने की जुंबिश, अभी मुझमें बाक़ी है।
माना चौतरफ़ा, नाउम्मीदियाँ ही हावी हैं,
जूझने की तड़प अभी भी मुझमें बाक़ी है
इंसानियत का दुनिया में, लहराना है परचम,
कुछ कर दिखाने का, मुझमें अरमान बाक़ी है।
तुम मुझे सराहो, नहीं मेरी बुलन्दी की आग़ाज़,
उम्मीद के दिए को जलाना बाक़ी है।
सत्य को आज पसंद कोई करता नहीं है,
सत्य को गगन तक पहुँचाना बाक़ी है।
अँधेरा हो गया है, जो उजालों को मिटा के,
उजाला फिर से लाएँगे, जिगर अपना जलाना बाकी है।
भाई नहीं है मुझे ख़ामोशी, जब भी सत्य झुका है,
इंतज़ार कर जीतेगा सत्य, मेरे जिस्म में अभी रूह बाक़ी है।
मेरी ईमानदारी को न परख, तू हार जाएगा,
अभी भी जीवन में, और भी बिसातें बाक़ी हैं।
साहित्य के पन्नों पर, नए पन्ने जोड़ना है अभी,
क्योंकि ख़्वाहिशों का सफ़र बाक़ी है।।
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