डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी' - गिरिडीह (झारखण्ड)
छवि (भाग १३) - कविता - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
सोमवार, अक्टूबर 04, 2021
(१३)
वर्ष हज़ारों बीत गए अब, आया नूतन काल है।
रहन-सहन मानव का बदला, बदल गई अब चाल है।।
विविध धर्म और जातियों में, जीवात्मा गण बँट गए।
जिस पथ पर चलना था सबको, उस पथ से यूँ हट गए।।
चल पड़े नए पथ पर मानव, लिए पताका हाथ में।
जाति-धर्म मज़हब की गठरी, लेकर अपने माथ में।।
ढम-ढम-ढम-ढम ढोल पीटकर, गीत धर्म का गा रहे।
मगर किसी को पता नहीं है, किस दिशि में जा रहे।।
पथ पर नाना मंदिर-मस्ज़िद, गुरुद्वारे अरु चर्च हैं।
इन्हें बनाने बनवाने में, अतिशय आर्थिक ख़र्च हैं।।
ख़र्च वहन करने को मानव, हरपल तत्पर है खड़ा।
मानवता जर्जर हालत में, एक ओर बेसुध पड़ा।।
लेकिन इसके बीच एक पथ, जगमग-जगमग कर रहा।
मानवता खिल-खिल हँसता सा, डग हरेक पल भर रहा।।
सत्य-न्याय के संग अहिंसा, इस पथ पे आबाद हैं।
साधु-संत सदाचारियों का, इस पथ पर तादाद हैं।।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर