डॉ॰ सहाना प्रसाद - बेंगलुरु (कर्नाटक)
ज़िंदगी - कविता - डॉ॰ सहाना प्रसाद
बुधवार, दिसंबर 15, 2021
अजीब है यह ज़िंदगी
बचपन गुज़र गया,
जवानी बीती,
बुढ़ापा आ गया
पर समझ नही आया।
कैसे संभाले दूसरो को,
कैसे संभाले ख़ुद को,
जब सोचा हो गए सयाने,
निभा पाएँगे सब कुछ
तब लगा एक और धक्का।
उफ, कैसे है इसकी चाल
चलते चलते क़दम
डगमगा जाते है
जब सोचा की संभल गए,
फिर फिसल जाते है।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर