नागेंद्र नाथ गुप्ता - मुंबई (महाराष्ट्र)
जिस-जिस पे यह जग हँसता है - ग़ज़ल - नागेन्द्र नाथ गुप्ता
बुधवार, जनवरी 19, 2022
अरकान : फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
तक़ती : 22 22 22 22
जिस-जिस पे यह जग हँसता है,
सचमुच वो आगे बढ़ता है।
अपनी दुनिया में जो खोया,
वो झंडा ऊँचा करता है।
सोच समझ के अपनी धुन में,
नदियों सा कल-कल बहता है।
मस्ती मन में, आशा मन में,
पर्वत-पर्वत ख़ुद चढ़ता है।
जुट जाए न पलट के देंखे,
मंज़िल का मिलता रस्ता है।
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