संजय राजभर 'समित' - वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
निशिभर नींद नहीं आई - गीत - संजय राजभर 'समित'
शुक्रवार, जनवरी 07, 2022
पूर्वी बयार था मतवाला,
छाई तन में अँगड़ाई।
याद सताती रही तुम्हारी,
निशिभर नींद नहीं आई।
देख मुझको आधी रात में,
नागिन भी डर के भागी।
लगी आग मेरे तन-मन में,
अब तो आओ अनुरागी।
बेसुध कैसे देह छुपाऊँ?
अंग-अंग जहर समाई।
याद सताती रही तुम्हारी,
निशिभर नींद नहीं आई।
जागे-जागे क्या करती फिर,
छत पर जाकर खोई थी।
सोच-सोच तेरी शरारतें,
हँस-हँस कर तब रोई थी।
कैसी है तेरी प्रीत सनम,
ख़ूब पल-पल गुदगुदाई।
याद सताती रही तुम्हारी,
निशिभर नींद नहीं आई।
गूँथी हुई हो छंद लय में,
जैसे मोहक कविताएँ।
भाँति-भाँति के भाव लिए हो,
हिय को मेरे हरषाए।
हम दोनों भी ऐसे ही हैं,
अजब प्रेम की गहराई।
याद सताती रही तुम्हारी,
निशिभर नींद नहीं आई।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर