कर्मवीर सिरोवा 'क्रश' - झुंझुनू (राजस्थान)
सुबह का मुख - कविता - कर्मवीर सिरोवा 'क्रश'
सोमवार, जनवरी 24, 2022
जनवरी की ये भीगी-भीगी शबनमी सहर,
ये कड़कड़ाता, ठिठुराता और लुभाता मौसम,
ये बहती सर्द और पैनी हवाओं की चुभन,
इस पर तिरा ज़िक्र-ए-जमील,
ज़ेहन के खेतों में
सरसों के फूलों के
सब्ज़ रूप की तरह हैं,
जो मुझें तुझसे मिलने को
बैचैन करती हुई आतुर करती हैं।
तिरे सिकुड़ते लबों की
नरमी के स्पर्श से
जवाँ होती धुँध
चहुँदिश ग़ज़ब ढा रही हैं,
मिरी कैफ़िय्यत का मत पूछो,
तिरे बिना रूह के हर क़तरे में
तन्हाई की बस्ती हैं।
शब रानी के खुले केशों से
बहती सर्द हवाएँ
उसके झीने दुपट्टे में छनकर आती हैं,
और तरन्नुम में तिरा नाम गाकर
मुझें हिज़्र की आग से जलाती हैं।
आसमाँ के घर में
रात के सोने के बाद
रात की सबसे ख़ूबसूरत बेटी 'सुबह'
जब धौरों के पीछे से
चुपके से
धीरे-धीरे
अपना उजला, चमकता मनभावन चेहरा
निकालती हैं,
मिरी आँखें जब सुबह का
ये अपार सुंदर मुख देखती हैं,
ख़ुदा की इनायत से
'क्रश' की छवि पाकर
कवि की दुनिया
रौशन हो जाया करती हैं।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर