सिद्धार्थ गोरखपुरी - गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)
चिरैया - कविता - सिद्धार्थ गोरखपुरी
गुरुवार, अप्रैल 21, 2022
कोयल भी शहर की हो ली
अब गाँव में बोले न बोली
पर पेड़ नहीं शहरों में
क्या ले ली है कोई खोली।
अब गाँव में कम हैं गवैया
आँगन में नहीं गौरैया
रिश्ते भी बिखर से गए हैं
कम ही हैं बाबू भईया
बिखर सी गई है अब तो
रिश्तों की हसीं रंगोली
कोयल भी शहर की हो ली
अब गाँव में बोले न बोली।
कम ही दिखता है कागा
जाने कहाँ है भागा
कोयल के घर में था रहता
जैसे सोने पे हो सुहागा
कोयल के बच्चों संग करता
रहता था हँसी-ठिठोली
कोयल भी शहर की हो ली
अब गाँव में बोले न बोली।
कहाँ गई है धोबिन चिरैया
जो बारिश में थी सदा नहाती
नभ से अक्सर धरती पर
अनगिनत चक्कर थी लगाती
बचपन के लफ़्ज़ों में थी
गौरैया की मौसी मुँहबोली
कोयल भी शहर की हो ली
अब गाँव में बोले न बोली।
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