जयप्रकाश 'जय बाबू' - वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
पत्थर हूँ - कविता - जयप्रकाश 'जय बाबू'
शनिवार, अगस्त 27, 2022
पत्थर हूँ टूटकर जुड़ना
मुनासिब न होगा,
ख़ुद-परस्त दुनिया में
साफ़गोई से
कुछ हासिल न होगा।
पत्थर हूँ...
उनसे कह दो चालों के
नश्तर न चलाएँ,
लकीरों के सिवा उन्हें
कुछ हासिल न होगा।
पत्थर हूँ...
जिन हाथों ने मुझे
संभाला था बार-बार,
सबने समझा कि वह
मेरा क़ातिल न होगा।
पत्थर हूँ...
उम्रभर सफ़र-ए-इश्क़ में
बस चलना ही है 'बाबू',
इस दरिया का कभी
कोई साहिल न होगा।
पत्थर हूँ...
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर