स्वाति कुमारी - छपरा (बिहार)
तिरंगा - कविता - स्वाति कुमारी
मंगलवार, अगस्त 16, 2022
घर-घर में तिरंगा हो,
छत-छत पे तिरंगा हो,
मंदिर भी नहीं छूटे,
मस्जिद पे तिरंगा हो।
मन में तिरंगा हो,
तन पे भी तिरंगा हो,
मज़हब से दूर होकर,
जन-जन पे तिरंगा हो।
मेरी शान तिरंगा हो,
मेरी आन तिरंगा हो,
दुनिया मुझे जाने ऐसे,
मेरी पहचान तिरंगा हो।
हैं कौन यहाँ ठहरा,
आया व गया एक दिन,
जब मैं जाऊँ इस दुनिया से,
मेरा कफ़न तिरंगा हो।
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