ईशांत त्रिपाठी - मैदानी, रीवा (मध्यप्रदेश)
आशीर्वाद - एकांकी - ईशांत त्रिपाठी
शनिवार, सितंबर 10, 2022
मयंक कुछेक दिन की छुट्टी मिलते ही अपने घर लौट रहा था। सरकारी कारणों से बस वाले उस समय अनशन पर जमे थे। चूँकि उसका सफ़र हमेशा बस के माध्यम से हुआ करता था इसलिए रेलवे स्टेशन की हर बात उसके लिए नवीन थी। वह समय पर रेलवे टिकट घर पहुँच कर टिकट ले लेता है। पर टिकट में प्राप्त विवरण उसके बुद्धि के लिए किसी स्पर्धा से कम नहीं रही। भोला सा चित्-रूप, बैठा था रेलगाड़ी के इंतज़ार में क्योंकि अभी सुबह के 6 बज कर 19 मिनट हुए थे और गाड़ी का समय 7:30 है। बैठा मयंक विचारों की दार्शनिक जगत में मानो खो रहा हो...
चने, समोसे, फल वालों का जोर-जोर से आवाज़, सफ़ाईकर्मी का इधर-उधर कार्य... जल्दी-जल्दी एक के बाद एक ट्रेन का आना-जाना तथा उन गाड़ियों से यात्रियों का उतरना और नए यात्रियों का चढ़ना; यह सभी क्रियाएँ उसको अप्रत्यक्ष रूप से नश्वर गतिशीलता अस्थिरता का पाठ सिखा रहीं थीं। शांत बैठा हुआ मयंक भूखा था क्योंकि उसका विगत दिवस एकादशी का व्रत था। उसके हाथ में बोतल है और कुछ पढ़ाई का सामान बैग में। उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि बाहर का कुछ खाए क्योंकि हमेशा ठाकुर जी को भोग लगाकर ही व्रत पारण करता था।
ढीला-ढाला शरीर और हाथ में टिकट लिए हुए 28-30 वर्ष का युवक आने-जाने वाले लोगों से पूछ रहा था कि अमुक गाड़ी कब आएगी। चूँकि वह बहुत साक्षर नहीं था फिर भी मानवीय चेतना का आकर्षण होता है भोलापन इसलिए वह मयंक को देखकर निर्द्वंद्व होकर उसके पास जाता है।
युवक: हमरी ट्रेन कब आएगी, तनिक बताए दीजिए।
मयंक: जी, अभी देखता हूँ।
(फोन पर ढूँढ़ने लग जाता है)
अच्छा! आपकी ट्रेन तो ग्यारह बजे आएगी और प्लेटफ़ॉर्म नंबर 3 पर।
(एक सुगठित मुस्कान के साथ )
युवक: ठीकय है पर जाना तो परै हे। रूकी लेंगे ग्यारह बजे तक।
(मयंक बातों का युग्म मिलन भाव मुख से प्रकट करता है।)
युवक: मालूम है अपना का हमही काल मालिक मार के भगा दिया है।
(मयंक अपनी गाड़ी के समय का ध्यान रखते हुए उस युवक को ससम्मान सुनता है।)
भा ऐसन कि कंपनी में कछु नए लेबर आए थे। एक लेबर मज़दुरी पूछी लिया... हम निकहा से बताया कि मालिक हम सबन को एक दिन का 500 रुपये देता है। मालिक यही बात पर गुस्साय के पाँच छह झापड़ मार दिया,
(हँसते हुए) और निकाल दिया। सोचा होगा, हमको काम न मिलेगा बाहर... अरे बचपन में जब 8 वरिस के रहे थे तब हमार पिता जी ख़ूब मारे थे। तबय से घर छोड़कर निकला हूँ। चार साल बीते पर वापस घर गया था मेहनत की कमाई से भरे लबालब जेब के साथ... तो अब काम न मिलेगा काहे।
मयंक: सही बात है! मेहनत करने वालों के लिए, हर जगह काम है।
युवक: आप कहाँ जा रहे हैं?
मयंक: घर, मध्यप्रदेश (मयंक उस बात का पालन कर रहा था कि अनजान लोगों से अधिक परिचय ठीक नहीं)।
युवक: पढ़ाई करत हो आप?
मयंक: जी! (विनम्रता की सुनहरी चमक के साथ)
युवक: पढ़िए पर देखिए आपकी नौकरी लगेगी। हम आशीर्वाद देता है आपको। जात से यादव है पर आशीर्वाद है कि आपकी नौकरी लगेगी बहुत ऊँची।
(बात सुनते हुए प्रसन्नता के आवेश से ओतप्रोत हो गाड़ी का समय होने से अपना डिब्बा ढूँढ़ने के लिए मयंक अपना बैग उठाने लगता है।)
मयंक: आपका बहुत बहुत कृतज्ञ हूँ और धन्यवाद। अब गाड़ी का समय हो गया है, मुझे जाना होगा।
युवक: चली, हम डब्बा ढूँढ़ने में मदद करता हूँ।
मयंक: गाड़ी में बैठ जाता है और युवक को नमस्कार करते हुए धन्यवाद देता है उसके साथ और सहयोग के लिए। मयंक सीट पर बैठकर आशीर्वाद की बात को बार बार याद करता हुआ रेलगाड़ी के शोर का आनंद ले रहा था। कैसी अद्भुत दुनिया है? एक संध्या वंदन करने वाला ब्राह्मण दक्षिणा के अनुपात में आशीर्वाद देता है और एक अपरिचित सामान्य व्यक्ति आशीर्वाद को पुनरुक्त करते हुए रोम-रोम में शक्ति का संचार कर देता है।
सत्य ही है, आशीर्वाद उम्र, जाति, शिक्षा से परे आत्मीयता का विषय है जो आज अपरिचित व्यक्ति ने बताया। एक शिशु भी किसी बुज़ुर्ग को, एक प्रिय अपने प्रियतम को, एक ग़रीब किसी अमीर को आशीर्वाद दे सकता है।आत्मीयता का संबंध निर्मल होता है और आत्मा की कोई आयु और वर्ण सत्ता नहीं होती।
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