आर॰ सी॰ यादव - जौनपुर (उत्तर प्रदेश)
दशानन दहन - कविता - आर॰ सी॰ यादव
बुधवार, अक्टूबर 05, 2022
हे रावण!
हम जलाते हैं प्रतिवर्ष
परंतु तुम जलते ही नहीं
आग की लपटो में घिरे
अट्टाहस हँसी हँसते हो
मानो कुछ कहना चाहते हो समाज को
जो तुम्हें जलाता है सहर्ष
और तुम आ जाते हो प्रतिवर्ष।
शायद तुम कहना चाहते हो
क्यों जलाते हो मुझे?
क्यों न जलाते हो
अपनी लिप्सा पिपासा?
क्यों न नष्ट कर देते हो
अपने घमंड अंहकार को?
क्यों न तिलांजलि देते हो
अपनी लोभी प्रवृत्ति को?
क्यों न जलाते हो
अपने कामुक विचारों को?
शायद यही शास्वत सत्य है
क्या मिलता है हमें
रावण को जलाकर प्रतिवर्ष
समाज में छिपे हुए भेड़ियों का
कब होगा अंत?
कब होंगी सुरक्षित
बहन-बेटियाँ समाज की
कब जलेंगे स्वार्थी लोभी
दानव समाज के।
आओ जलाएँ इस बार
बुराइयाँ समाज की
वध करें इस बार
स्वार्थ, लालच और अंहकार की
मिटा दें दूरियाँ मन से मन की
फिर से कायम करें
रामराज श्रीराम की।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर