सुरेंद्र प्रजापति - बलिया, गया (बिहार)
यही बुद्ध हैं - कविता - सुरेन्द्र प्रजापति
सोमवार, नवंबर 07, 2022
एक शब्द
जो बड़ी क्रूरता से उछाला गया
घृणा की आग पर तपाया गया
उड़ाया गया उपहास
तीखे वचनों से दूरदुराया गया
"दुर हटो! दुर हटो!!"
और वह मौन मुस्कान में
करुणा के आदिम गान में
अहिंसा के शरण में
महानिर्माण के अवतरण में
ज्ञान चिंतन में मग्न हाथ
बढ़ता गया निर्भीक क़दम
प्रज्ञा का, बुद्ध का
विनय का बोध है
मानवता का शोध है
हाथ में पात्र है
कुछ चंद मुठ्ठी दाने मात्र हैं
क्या ज़माने की घृणा
उसकी करुणा से बड़ा है
जो द्वारे पर भिक्षुक खड़ा है?
आँखों में दया का, करुणा का
कल्याण का, दुनिया जहान का युद्ध है
पीड़ा प्रबुद्ध है, यही बुद्ध हैं।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर