नीतू कोटनाला - दिल्ली
यादों के अवशेष - कविता - नीतू कोटनाला
शुक्रवार, मई 26, 2023
सभ्यताओं का चेहरा
तुम्हारे जैसा होता है
जिसमें होते हैं
मेहनत के अवशेष
होती है वो गूढ़ भाषा
जिसे समझा जाना मुश्किल है
होते हैं वो दुख भरे अनुभव
जैसे ढहा देती है प्रकृति
किसी सभ्यता को
बस एक अंतर है
तुम में और सभ्यता में
सभ्यता आती है
चली जाती है
लेकिन तुम एक बार आते हो
और फिर यह प्रक्रिया
दोहराई नहीं जाती
और बच जाते हैं
तुम्हारे मेरे बीच
यादों के वो अवशेष।
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