डॉ॰ प्रियंका सोनकर - वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
नदी और बाढ़ - कविता - डॉ॰ प्रियंका सोनकर
शनिवार, अक्टूबर 07, 2023
नदी में बाढ़ का आना
उसकी आँखों में चमक आना था
इस बार बूढी दादी को
छोटी-छोटी
मछलियाँ याद आई
साथ याद आया
उसे अपना बचपन
गवना से पहले
जब एक बार उसके गाँव में बाढ़ आईं थीं
सखी सहेली मिलकर,
दुपट्टा हाथ में लिए
दौड़ लगाई थी सबने एक साथ
एक-एक बित्ते के हाथों ने, पकड़ा दुपट्टे के चारों कोनों को,
पानी में डुबोया,
और मछलियों के जाल में फँस जाने को उत्साहित ही थीं
ये मछलियाँ मछलियाँ नहीं थीं
साथ थीं, उमंग थीं, याराना थीं
अल्हड़ पन की।
अब न नदी है
न बाढ़ है
उसके गाँव में;
नदियों का सूखना
दादी की आँखों की चमक का विलुप्त हो जाना था
जैसे नदियाँ धीरे-धीरे विलुप्ति के मुहाने पर खड़ी रो रही हैं।
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