वृन्दा सोलंकी - जूनागढ़ (गुजरात)
आश - कविता - वृन्दा सोलंकी
बुधवार, जनवरी 10, 2024
तारे देखो अँधेरी रात के
उन्हें पता है अँधेरा है पास में
फिर भी वो चमकते है
उजाला देने की आश में
फूलो को देखो बाग़ में
मुरझा जाएँगे समय की माँग में
फिर भी खिलते है
ख़ुशबू देने की आश में
कुदरत को देखो सामने
रहती है वर्तमान में
पता है सबकुछ अंत है
फिर भी चलती है चलते
रहने की आश में
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