गाँव - कविता - संजय राजभर 'समित'
शनिवार, जनवरी 06, 2024
शाम होते ही
अँधेरा छा जाता था
कच्ची सड़कें
बरसात में चलना मुश्किल होता था
रात में उमस और मच्छर
खाने के लाले
फटे पुराने कपड़े
रिसता छप्पर
टपकता खपरैल,
फिर भी
प्यारा था मेरा गाँव
आज भी है
जी चाहता है
आज भी वही माहौल मिले
क्योंकि उसमें
सादगी थी संतोष था
सुकून था।
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