प्रेम - कविता - रोहित सैनी
मंगलवार, जनवरी 02, 2024
प्रेम!
धूप है हमारे चेहरे की...
सितारों की जग-मगाहट, जिसमें...
सब कुछ सुंदर दिखता है
शीतल, शांत, मद्धम रौशनी है चाँद की।
प्रेम...
हमारी आँखों में चमकता है...
हमारी मुस्कान में महकता है...
हमारा माथा...
एक खुली भूमि है प्रेम के लिए,
हमारे गाल प्रेम की छुअन के द्योतक हैं।
हमारी बाजुएँ क्षितिज है,
जहाँ प्रेम ख़ुद को पूर्ण पाता है!
मुलाक़ातें...
खाद, पानी, रौशनी है, जिनसे...
प्रेम का फूल खिलता है।
आलिंगन से महकते हैं प्रेम के फूल...!
प्रेमी फूल से कम क्या हो सकते हैं
फूल से ज्यादा सुंदर क्या है इस संसार में!
मनुष्य हो,
पेड़ हो, या कोई जीव
ख़ुद ईश्वर!
यह समूची प्रकृति
सब प्रेम है...
सभी कुछ प्रेम की प्रतिकृति हैं।
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