होली आई रे - गीत - अजय कुमार 'अजेय'
रविवार, मार्च 24, 2024
होली आई रे होली आई रे।
मस्ती छाई रे मस्ती छाई रे।
रंगों से भरी पिचकारी,
छोरा-छोरी चोरी मारी।
गुब्बारे में भर-भर रंग सारे,
हुरियारे साध-साध कर मारे।
सतरंगी फ़िज़ा दई बनाई रे।
होली आई रे......
टेसू रंग से भरी कड़ाही,
चौराहे पर धूम मचाई।
फाड़ें लत्ता लला रिसयाने,
पटक कड़ाही पुरजोर नहाने।
बुरा ना मानों होली गाई रे।
होली आई रे......
पैसा सड़क पै चिपकाए,
भोले-भालन ख़ूब बनाए।
टोपी-अँगोछा काँधे पाए,
अटका काँटे खूब उठाए।
ख़ूब हँसी-ठिठोली रुसवाई रे।
होली आई रे......
मस्ती में तन छोरा-छोरी,
मन ही मन जोरा-जोरी।
मन प्रेम-हिलोर रसिया,
तन छल विभोर छलिया।
साँची-प्रीत नहीं तरुणाई रे।
होली आई रे......
होरी रंग में भीगो दई अंगिया,
बची ना पिचकारे से जँघिया।
जीजा-साली चुहल गहरे,
सखी-सखा मनुहारी चेहरे।
देवर भौजी एक-दूजे रंग लगाई रे
होली आई रे......
सबसे सुंदर जग में ब्रज होरी,
छोरा-छोरी जोरा-जोरी।
वृंदावन में लठ्ठमार होरी,
गोपी ढाल गोपिका तोरी।
सैंया ने दई मरोर कलाई रे।
होली आई रे......
सखी बुलावे कैसे जाऊँ,
पिया संग ना खेल पाऊँ।
तन से चली मायके जाऊँ,
मन दिन रात साँसरे पाऊँ।
छूटेगा जहाँ मेरा कन्हाई रे।
होली आई रे......
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