अनकही बातें - कविता - प्रवीन 'पथिक'
मंगलवार, जुलाई 02, 2024
कभी कभी जीवन में भी कुछ ऐसा क्षण आता है,
दर्द सिसकता है भीतर, मुस्कान दिखाया जाता है।
मन की मायूसी का जब, चीत्कार उठता है उर में,
चैन कहीं नहीं मिलता, ना बाहर ही; ना ही घर में।
कोई ऐसा नहीं मिलता, जिससे मन की बात कहें,
दिल बैठा यूॅं ही जाता है, कैसे अपनी जज़्बात सहें।
जीवन के बिखरे पन्नों पर भावों की लेखनी रुक जाती,
उमड़ता है अनंत विचार, पर अभिव्यक्ति नहीं है दे पाती।
सब कुछ कितना परिवर्तन सा, सूना-सूना लगता है,
इच्छाएँ सभी हैं मर जाती, दुःख दूना सा लगता है।
जीवन की संजीवनी मेरी, पर तुम्हारा अब काम नहीं,
ऊहापोह में डूबे हुए इस मन को कहीं आराम नहीं।
कुछ ऐसी पीड़ा होती है, जो न कभी कही जाती,
उमड़ते उर में शत विचार, वह टीस नहीं सही जाती।
सुना है निज हृदय बयाँ कर मन हल्का हो जाता है,
पर, यादें ताज़ी हो जातीं, औ व्यक्ति उसमे खो जाता है।
इक चाहत के पीछे जन की, कितनी इच्छाएँ बलि गईं,
कितनों के सपनें टूटे, कितनों की ज़िंदगी चली गई।
जिसको चलने का ढंग नहीं, फिर भी वह राह बताता है,
जिसे अक्षर का ज्ञान नहीं, अक्षर अनन्य कहलाता है।
सब कुछ ऑंखों का धोखा है, कुछ तो ऑंखों का पानी है,
कुछ तो अपनी भी गरिमा है, सबकी अपनी कहानी है।
दुनिया की बातें मत सोचो, पथ में सब टाॅंग अड़ाते हैं,
जब कुछ भी नहीं कर सकते तो व्यंगों की तीर चलाते हैं।
दुख जिन बातों से होता हो, उसे भूल आगे चलना होगा,
राह में जितने कंटक आए, उसे कुचल कर बढ़ना होगा।
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