मेरी हार ही मेरी असली ताक़त है - कविता - तेज नारायण राय

मेरी हार ही मेरी असली ताक़त है - कविता - तेज नारायण राय | Hindi Kavita - Meri Haar Hi Meri Asali Taqat Hai - Tej Narayan Rai. हार पर कविता
मेरी हार जब मेरे गाल पर 
तमाचा बनकर लगती है 
तब बेशक तिलमिला उठता हूँ मैं लेकिन धैर्य नहीं खोता कभी 

गिर जाता हूँ सोच की गहरी खाई में और गिरकर सोचता हूँ मन ही मन 
अपनी कमज़ोरियों के बारे में 

फिर मन ही मन 
उतरता हूँ धीरे-धीरे 
मन की गहराई में 
और बड़े शांत भाव से टटोलता हूँ अपने अंदर की ताक़त को 
 
सोचता हूँ जो लोग मेरी ख़ामोशी को मेरी कमज़ोरी समझ ताने मारते हैं 
और कुछ ना कर पाने का 
ग़लत अर्थ निकाल बैठे हैं 
यहाँ तक कि 
मेरी हार को मेरी कमज़ोरी समझ 
सिक्के की तरह उछालते 
लगाते हैं 
भरी महफ़िल में जोरदार ठहाके 

अपनी ताक़त के तराजू पर 
तौलते हैं मेरा वजूद 
और बताते हैं लोगों को कि 
उनके सामने मेरा वजूद 
तकिये में भरे रुई सा है 

उन्हें घमंड है कि वह 
एक फूँक मारकर उड़ा देंगे हमें 
हवा में 

लेकिन उन्हें कैसे बताएँ 
कि मेरे समुद्र से गहरे शांत मन में 
जब उठेगी एक दिन लहरें...
तो बहा ले जाएँगी 
उनके बसे बसाए 
घमंड के साम्राज्य को 
और जिसमें डूब जाएगा 
उनका अहंकार 

कोई जाकर बता दे उन्हें 
कि हर हार का मतलब 
सिर्फ़ हार नहीं होता 
और न ही हर जीत का मतलब 
सिर्फ़ जीत होता है 
क्योंकि मेरी हार ही 
मेरी असली ताक़त है 
जो एक दिन मेरी जीत में बदलेगी। 

तेज नारायण राय - दुमका (झारखण्ड)

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