कैसे आवाज़ हमारी वो दबा सकते हैं - ग़ज़ल - अरशद रसूल

कैसे आवाज़ हमारी वो दबा सकते हैं  - ग़ज़ल - अरशद रसूल | Ghazal - Kaise Aawaaz Hamari Wo Daba Sakte Hain - Arshad Rasool
अरकान : फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
तक़ती : 2122  1122  1122  22

कैसे आवाज़ हमारी वो दबा सकते हैं,
हम अगर चाहें तो कोहराम मचा सकते हैं।

माँगकर पैर वह कद अपना बढ़ा सकते हैं,
क्या कहीं ऐसे कोई दौड़ लगा सकते है?

रूह में आप उतर जाएँ बहुत मुश्किल है,
हुस्न की शान में नगमे ही सुना सकते हैं।

आब-ओ-दाने का बंदोबस्त नहीं है लेकिन,
हम परिंदों को तो पिंजरे से उड़ा सकते हैं।

हार जाते हैं बहुत शौक़ से जीती बाज़ी,
क़त्ल रिश्तो का वही लोग बचा सकते हैं।

चापलूसी का जिन्हें ख़ूब हुनर आता है,
ये क़सीदे तो वही लोग सुना सकते हैं।

जिनको फ़ुर्सत है ज़माने के ग़मों से 'अरशद',
तेरी राहों में वही फूल बिछा सकते हैं।

अरशद रसूल - बदायूं (उत्तर प्रदेश)

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