देर लगे पर आना तुम - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव

देर लगे पर आना तुम - कविता - चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव | Prem Kavita - Der Lage Par Aana Tum | प्रेम पर कविता, Hindi Love Poem
बूँद-बूँद बरसात जब हो
सावन की सौग़ात जब हो
दिल के दरिया में डूबा कोई
ख़्वाब नया सँवार जब हो
मेघ घिरे जब धरा-सरोवर
रंगीन घटा बन जाना तुम
मद्धम राग सुनाना तुम
देर लगे पर आना तुम।

चाँदनी रात की चादर बिछे
चाँद किसी का हो जाए जब
प्रेम की बगिया में खिला कोई
फूल नया मुस्कान बन जाए जब
सजी हो धरती की हरियाली
ख़ुशबू बनकर आना तुम
देर लगे पर आना तुम।

चाँदनी जब शरमा जाए
रात की चुनर लहराए
मोहब्बत का पैग़ाम लिए
दिल तेरा घबराए जब
तारों की महफ़िल में तुम
रौशनी बनकर आना तुम
देर लगे पर आना तुम।

पत्तों पर जब ओस गिरे
बनके आँसू दिल से झरे
इश्क़ की राहों में कोई
अपना रास्ता भूले जब
फूलों की ख़ुशबू बनकर
साथ निभाने आना तुम
देर लगे पर आना तुम।

बादल घिर-घिर आए जब
फूलों में रंग न रह जाए जब
प्यार के गीत गाने वाला
अल्फ़ाज़ भूल जाए जब
धूप बनकर तुम आ जाना
नई रोशनी लाना तुम
देर लगे पर आना तुम।

रात जब भी वीरान हो
चाँदनी भी अनजान हो
दिल की राहों में कोई
सपनों को छोड़ जाए जब
उम्मीद की किरन बनकर
फिर से दिल को बहलाना तुम
देर लगे पर आना तुम।

समंदर चुप हो जाए जब
लहरें ठहर सी जाएँ जब
दिल के साहिल पर कोई
ख़्वाब बिखर जाए जब
चाँद बनकर रात की बाहों में
नया उजाला लाना तुम
देर लगे पर आना तुम।

जब फूलों की महक खो जाए
बाग़ भी उदास हो जाए
प्रेम की धुन गुनगुनाता मन
साज छोड़ जाए जब
बहार बनकर इस जीवन में
नई ख़ुशी लाना तुम
देर लगे पर आना तुम।

चक्रवर्ती आयुष श्रीवास्तव - प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश)

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