कारगिल हिल - कविता - महेश कुमार हरियाणवी
सोमवार, अगस्त 12, 2024
कारगिल की कहानी है, जो सबको सुनानी है।
लड़ गए देखो वीर जवान
साँसे महकी ख़ुशबू तान।
आतंकी से छीना सम्मान,
बन गए मिट्टी की पहचान।
जा, दुश्मन बैठा था ऊँचा,
कुंडली में शिखर समूचा।
हिन्द को सद् कतई न भाईं,
दहके राख तलक न पाई।
गर्जन की निशानी है, जो सब को सुनानी है।
रखते इरादे सैनिक नेक,
शांति की कर पहल अनेक।
गर्दिश की जो आहट देख,
घुटने सिंहों के दे टेक।
उस शहादत को शत नमन है,
जिनसे सुरक्षित चमन है।
दुश्मन आज तलक न बोला,
दहका था किन-किन चोला।
पत्थरों की ज़ुबानी है, जो सब को सुनानी है।
वो उग्रवादि पाक निशानी,
साज़िश ने बंदूकें तानी।
भारत ने भी हार न मानी,
विजयरथ की देख जवानी।
जलता देख दहकता शोला,
रज हुआ भहरूपी चोला।
तिरँगा लहर-लहर लहराया,
वन्दे भारत मिलकर गाया।
साहस की रवानी है, जो सब को सुनानी है।
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