कमल पुरोहित 'अपरिचित' - कोलकाता (पश्चिम बंगाल)
खुदीराम बोस - कविता - कमल पुरोहित 'अपरिचित'
रविवार, अगस्त 11, 2024
तू देश का वो लाल था,
तेरा चमकता भाल था।
हिम्मत तेरी विशाल थी, वो शक्ति भी कमाल थी,
होता नहीं निहत्था तो, तू दुश्मनों का काल था।
तू देश का वो लाल था...
तू उम्र से छोटा रहा, जिगरा मगर मोटा रहा,
वो खौलता लहू तेरा, रग-रग में बस उबाल था।
तू देश का वो लाल था...
तू चक्रव्यूह में फँसा, अभिमन्यु सा रहा ठगा,
पहचान तू सका नही, अंग्रेज का जो जाल था।
तू देश का वो लाल था...
वे उम्र खेलने की थी, फाँसी न झेलने की थी,
माँ से विदाई ले चला, माँ का तू नौनिहाल था।
तू देश का वो लाल था...
अनमोल ज़िंदगी तेरी, हर बार बंदगी तेरी,
कहती है यह कलम मुझे, चेहरा तेरा जलाल था।
तू देश का वो लाल था...
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