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राम मेरा भी रोया होगा - कविता - राघवेंद्र सिंह | कौशल्या विलाप कविता
राम मेरा भी रोया होगा - कविता - राघवेंद्र सिंह | कौशल्या विलाप कविता
सोमवार, अगस्त 05, 2024
एक दिवस रनिवास कोठरी,
बैठ अभागन सोच रही थी।
विह्वलता के दीप तले वह,
स्वयं अश्रु को पोंछ रही थी।
सोच रही थी हाय विधाता!
तूने यह विधि ठानी थी।
क्या उसके ही हिस्से में यह?
अविदित पीड़ा आनी थी।
देख स्वयं का सूना आँचल,
अगणित प्रश्न बनाए होंगे।
विरह अग्नि में स्वयं ही जलकर,
विरह गीत भी गाए होंगे।
आज स्वयं सरयू की धारा,
अपना अंचल सुखा गई।
माँ की ममता, पुत्र मोह में,
रघुकुल-रीति निभा गई।
आज शिथिलता का अनुभव वह,
कैसे इस पल आन पड़ा?
उसके नयनों का दीपक ही,
दुर्गम पथ अनजान बढ़ा।
छोड़ अयोध्या की यह नगरी,
वनवासी बन सोया होगा।
सोच रही थी माँ की ममता
राम मेरा भी रोया होगा।
क्यों उसने कोमल पुष्पों को,
भेज दिया वन आलय में।
पितृ वचन कुल मर्यादा न,
बाँध सकी ममतालय में।
बैठी माँ की सूनी ममता,
देख रही हर वस्तु राम की।
घुटुरुन चलन, पैर पैजनिया,
कमर-बंध सुख वस्तु राम की।
दिवा स्वप्न में नित ही खोकर,
स्वयं व्यथा को पाती है।
सोच राम की करुण व्यथा वह,
अश्रु कथा ही गाती है।
हाय कैसा राम मेरा वह!
कैसी होगी जनक लली?
कैसा होगा लखन पुत्र वह?
कैसी होगी विपिन गली?
छोड़ महल की ठाठ-बाट वह,
पर्ण कुटी का घर होगा।
कंदमूल फल, जल ही जीवन,
सोचो क्या अंतर होगा।
हाय इस अंतर में पड़कर!
जगतपति भी खोया होगा।
सोच रही थी माँ की ममता,
राम मेरा भी रोया होगा।
पितृ-वचन और कुल हेतु ही,
अगणित कष्ट सहे होंगे।
न जाने बँध मर्यादा में,
कितने अश्रु बहे होंगे।
त्याग, तपस्या सूर्य तिलक वह,
छोड़ गया सूना आँगन।
चौदह वर्ष कटेंगे कैसे?
सोच रहा है अंतर्मन।
व्याकुल नयन, वियोगी काया,
सदा प्रतीक्षा में होती।
आया होगा राम मेरा यह,
सोच-सोच हर क्षण रोती।
सोच रही है माँ की ममता,
छूटा देश, महल भी छूटा।
सरयू छूटी, छूटे प्रिय सब,
भाग्य स्वयं ही उससे रूठा।
हाय! कैसे कटते होंगे?
पर्णकुटी पर दिन और रात।
कैसी रीति निभाने आया?
सहकर अगणित हृदयाघात।
हाय रीति में बँधकर उसने!
वसुधा को ही भिगोया होगा।
सोच रही थी माँ की ममता,
राम मेरा भी रोया होगा।
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