रूशदा नाज़ - वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
सपने - कविता - रूशदा नाज़
रविवार, अगस्त 11, 2024
बचपन में परिवर्तित होते थे हमारे सपने
कभी डॉक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षक, इंजीनियर
सब कुछ चाहते थे
मानों छू लेना चाहते थे आकाश
उम्र के इस पड़ाव पर मालूम हुआ
एक सपने को शिद्दत से चाहना
निरंतर काम करते है कितना मुश्क़िल
भटकते है मन, भटक जाते है हम भी
कितना मुश्किल होता है
अडिग होना,
डटे रहना,
उम्र के इस पड़ाव पर मालूम हुआ
एक लक्ष्य साध लेना चाहिए,
और
बन जाना चाहिए सूर्य की भाँति
सीख लेना चाहिए तपना
सीख लेना चाहिए डटे रहना
और
सीख लेना चाहिए धैर्य
संभवतः
फिर चमकेंगे सूर्य की भाँति!
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