सत्यकाम - भोपाल (मध्य प्रदेश)
वो कहती है कि - कविता - सत्यकाम
शुक्रवार, अगस्त 16, 2024
वो कहती है कि, अभी साथ हूँ तुम्हारे,
पर आख़िरी वक्त तक की उम्मीद ना रखना,
क्योंकि आज और कल में फ़र्क़ है थोड़ा।
वो कहती है कि, साथ हूँ मैं थोड़ी दूर तक,
मंज़िल एक ना समझना,
क्योंकि सफ़र और मंज़िल में फ़र्क़ है थोड़ा।
वो कहती है कि, सबको ख़ुश रखना एक आदत है मेरी,
तुम इसे प्यार ना समझना,
क्योंकि पसंद और मोहब्बत में फ़र्क़ है थोड़ा।
वो कहती है कि, कोई ऐतराज़ नहीं कि रोज़ बातें होती हैं तुमसे, पर मेरे दिल के इतना क़रीब भी मत समझना,
क्योंकि आदत और लत में फ़र्क़ है थोड़ा।
फिर आखों के किनारों से सफ़र करके,
ज़ुल्फ़ों में हाथ फेरे,
वो कहती है कि, बहुत ख़ूबसूरत लग रहे हो आज तुम,
पर मुझे अपनी दीवानी ना समझना,
क्योंकि दिल लगाने और बहलाने में फ़र्क़ है थोड़ा।
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