श्वेता चौहान 'समेकन' - जनपद मऊ (उत्तर प्रदेश)
मझधार - कविता - श्वेता चौहान 'समेकन'
शनिवार, अप्रैल 05, 2025
मैं प्रेम की कश्ती हूँ,
मेरा जीवन मझधार में है!
हे प्रिय! तुम माँझी बनो,
हमें चलना उस पार है!
प्रेम न ठहरे सागर जैसा,
कलकल-छलछल बहता रहता!
एक तट से होकर दुजे तट तक जाता,
कितनो के यह हृदय हिलाता,
प्रेम नदी की धार है!
बीच भँवर में जब मैं रूठूँ,
लहर थपेड़ों से जब मैं टूटूँ,
तुम कहना मुझसे हे प्रिय!
तुम अभी न हारों,
मेरे हाथों में प्रेम की पतवार है,
हमें चलना उस पार है!
हो लाख कश्तियाँ साहिल पर,
तुम चुनना मुझे,
चलना मेरे संग आख़िर तक!
मैं श्वास-श्वास में तुम्हें बाँधुगी,
तुम्हारे प्रेम को कभी न साधुँगी!
मुझे नहीं मझधार में रहना,
चाहे नदी हो,
या हो प्रेम का झरना!
हमें चलना उस पार है,
प्रिय! मुझे साहिल की दरकार है!
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर