रंग न मन मोहा - कविता - गौरव ज्ञान

रंग न मन मोहा - कविता - गौरव ज्ञान | Hindi Kavita - Rang Na Man Moha - Gaurav Gyaan. Hindi Poem on Lord Krishna | कृष्ण पर कविता
श्याम का रंग,
साम क्यों?
बाबरी बन राधा,
मीरा से पुछी,
मीरा बोली–
ना जानु मा साम रंग,
ना जानु मा गोरी, मोह तो 
मीरा हूँ दर्श की प्यासी,
श्यामा के रंग को ना तरासी।
राधा सोच की अग्न में झुलसी,
प्रित निभाऊँ मा श्यामा संग,
मित मिलन परछाईं होत, जैसे
जग-सखी सब कहत मोहे। ऐसे
राधा श्यामा के प्रित में बाबरी,
मन प्रित अंखियन में उड़ेले,
बैठी अकेली यमुना किनारे,
छन सोच अग्न से छलकी,
नैन स्वर अंखियन से बरस,
जा मिली यमुना के जल में।
प्रित मोह अखियाँ तरसे,
श्यामा रंग जो ना समाए,
मन बाबरी हो गई, रे
मन श्यामा रंग प्रित निभाए।

गौरव ज्ञान - पटना (बिहार)

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