संदेश
दरियादिली - ग़ज़ल - महेश 'अनजाना'
अरकान: फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन तक़ती: 212 212 212 जो दरियादिली दिखा जाते हैं, इंसानियत भी निभा जाते हैं। हर किसी का तो अक्स याद नहीं, एक आ…
संकट जगाता मानवता - कविता - डॉ. रवि भूषण सिन्हा
मानव पर जब संकट आता है, मानवता जाग जाता है। गली-गली या मुहल्ले हो बुरा वक़्त जब आता है। आँखों में खटकने वाला भी, आँखों का तारा बन जाता …
नन्दू - कहानी - डॉ. सरला सिंह "स्निग्धा"
नन्दू को पानी से बहुत डर लगता था। सलोनी को उसकी आदत का पता था, वह प्रायः जान बूझकर जब भी उसे पानी पिलाती उसके मुँह पर पानी छिड़क देती। …
मर गयी है इंसानियत - कविता - विजय कुमार निश्चल
मर गयी है इंसानियत फैल रही है हैवानियत मासूम बच्चियों से बलात्कार खो रही है आदमियत बेटियाँ घर से बाहर निकलते डरती है जैसे तैसे वहशी बु…
क्या दो ही थे हैवान? - कविता - सूर्य मणि दूबे "सूर्य"
यह कविता समाज के उन लोगों को समर्पित है जो समाज में सामने होते अत्याचार पर मात्र तमाशा देखते रहते हैं मदद की कोई कोशिश नहीं करते। बल्ल…
इंसानियत का बाज़ार कर गया - ग़ज़ल - मोहम्मद मुमताज़ हसन
यूं भी कोई मुझको बे-ज़ार कर गया! बिला - वजह ही तक़रार कर गया! खुला रक्खा था दर मैंने भी अपना, खड़ी कोई यहां दीवार कर गया! बिना आंग…
समय नही है - कविता - रमेश चंद्र वाजपेयी
इंसान का सोच इतना ओछा हो गया है और वेझिझक हो भयभीत परिस्तिथि में कनी काट कर आगे बढ़ जाता है और सहज तरीके से कहने लगता है यार समय नही है…
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