संदेश
खँडहर-सा घर - कविता - निवेदिता
ख़ाली सा शहर, जिसमें एक खँडहर-सा घर। दरारों का जाल, आधी पूरी सी दीवार। टूटी-सी खिड़की पर तकती नज़र झाँकती सुनी राहों को हर पहर। हवा के ह…
घर का ज़िम्मेदार - कविता - अनिल कुमार केसरी
घर का ज़िम्मेदार बने रहना, सबकी ज़िम्मेदारी में खड़े रहना, भगवान क़सम...! बहुत, बहुत ज़िम्मेदारी का काम है। परिवार के सारे रिश्तों को, …
घर आँगन - दोहा छंद - डॉ. राम कुमार झा "निकुंज"
घर आँगन सुन्दर सजे, मिल जुल नित सहयोग। त्याग शील पौरुष सुभग, नीति प्रीति बिन रोग।। खिले कुसुम घर प्रगति के, आँगन भारत देश। सुखद शान्ति…
गाँव का घर - कविता - गुड़िया सिंह
दरक गई है दीवारे, छत उसकी अब टपकती है, वो गाँव वाला घर तेरा, जिसमें अकेली "माँ" रहती है। बचपन मे जहाँ बैठकर, तू घण्टो खेला क…
घरौंदा - हाइकु - अन्जनी अग्रवाल "ओजस्वी"
एक सपना मन में सजाना है बने घरौंदा बना घरौंदा जीवन खुशहाल नही बेहाल बिखरी जब अरमानों की आस नही वो पास जीना है तो मत हो तू उदास रख वि…
भोर हुई वो घर से निकला - कविता - आर एस आघात
भोर हुई वो घर से निकला, जग सारा जब सोया था। तन उसके दो गज का गमछा, शिक़वे न किसी से करता था। सुबह से लेकर दो पहर तक, रहता वो खलियानों…
माटी का घर - कविता - सुधीर श्रीवास्तव
याद आता है माटी का वो घर जिसमें हमारा बचपन बीता। मोटी मोटी दीवारों वाला वो खपरैल का घर उसी माटी वाले घर में हम पले, बढ़े, खेले कूदे और…
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