संदेश
जातियों में बँटा हुआ देश - कविता - सूर्य प्रकाश शर्मा 'सूर्या'
जातियों में बँटा हुआ देश गठ्ठर से अलग हुई उन लकड़ियों जैसा है जिन्हें कोई भी चाहे तब तोड़ सकता है बिना किसी परेशानी के। लेकिन हरेक लकड…
जाति की जय - कविता - गोलेन्द्र पटेल
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर सिर्फ़ दलितों के नहीं, पूरे देश के नायक हैं वे उस गीत के गायक हैं जिसमें नेह व न्याय की लय है भूख और भाषा की ग…
अस्मिता - कविता - डॉ॰ अबू होरैरा
कौन हो बे तुम? पसमांदा मुसलमान हैं साहब अबे कौन सी जात से हो अन्सारी हैं साहब ओह्ह... जुलाहा हो! जी साहब। आपके तन को ढँकने वाला मेहनत…
जाति, जाती नहीं - कविता - शिवानी कार्की
माँ, आपने मुझे बचपन से सिखाया था... कि पानी देवता हैं सबका साँझा है और तुम तो शुक्र करो कि तुम इंसान हो... इतना बड़ा लोकतंत्र है और ना…
जाति-पाँति - कविता - सिद्धार्थ गोरखपुरी
जाति-पाति में मत उलझो, रहना है हमें हर ठाँव बराबर। सिर के ऊपर सूरज तपता, तो पाँव के नीचे छाँव बराबर। चमड़े का है रंग अलग पर लहू एक जैसा…
प्रेम और जाति-धर्म - कविता - नीरज सिंह कर्दम
मैं आ जाती तुम्हारे साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलने को, पर मेरे पैरों को जकड़ लिया जाति-धर्म की बेड़ियों ने। हम मिलते थे हर रोज़ उस स्कूल के…
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