संदेश
जाड़े के दिन - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
हैं जाड़े के दिन औ' ख़ूब प्यारी लग रही धूप। हैं तृप्त लगते तालाब, कुँए, झील। काला-काला कौआ लगता वकील॥ बेचती चूड़ी-बिंदी मनिहारी– लग…
शिशिर सुंदरी - कविता - सतीश पंत
नवल भोर संग धवल कुहासा शिशिर ओढ़ जब आई, वसुंधरा से शैल शिखर तक मेघावली सी छाई। शिशिर सुंदरी रूप मनोहर देख देह सकुचाई, शीत वायु के प्रब…
शरदाकुल कुहरा प्रलय - दोहा छंद - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
शरदाकुल कुहरा प्रलय, अगहन पूस बसात। सिहराती तनु अस्थियाँ, कौन सुने जज़्बात॥ विषम शीत कुहरा गहन, कहाँ वस्त्र तनु दीन। आज़ादी हीरक बरस,…
ठंड की मिठास - कविता - रविंद्र दुबे 'बाबु'
ठंडी सिहरन शाम शहर से, तन मन ठिठुरे घर आँगन भी। तेज़ किरण लालिमा भाती, सूरज जागे देर, जल्द शयन भी॥ ओस की बूँदें हल्की-हल्की, मोती बनकर …
जाड़े का मौसम - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
सबको बहुत लुभाता है जाड़े का मौसम। महल, झोपड़ी, गाँव शहर हो। या फिर दिन के आठ पहर हो।। कभी कभी तो लगता है भाड़े का मौसम। कंबल, स्वेटर …
ठंड का मौसम यादें तेरी आती बहुत हैं - ग़ज़ल - भगवती प्रसाद मिश्र 'बेधड़क'
अरकान : फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ऊलुन तक़ती : 22 22 22 22 22 122 ठंड का मौसम यादें तेरी आती बहुत हैं, तेरी खट्टी-मीठी बातें …
कम्बल - कविता - सुषमा दीक्षित शुक्ला
सर्द के दरमियाँ ये जो कम्बल है, ये तो शीत इलाक़ों का सम्बल है। उफ़ ये ठिठुरती फ़िज़ाएँ! कंपकपाती सर्द घटाएँ! कहीं बारिश, कोरोना, बर्फ़गोले,…
प्रातः पूस की - कविता - अनूप मिश्रा 'अनुभव'
पूष की प्रातः आभा को, ढक दी श्यामल मेघ की चादर। खेल रहे रजनी संग जैसे, आँख मिचोली खेल प्रभाकर। संध्या की सारी को पहने, डाले भोर भरम …
हिमालय की गोद में - कविता - राम प्रसाद आर्य
बरफ़ रजाई ओढे, ये परवत जाल है। धूप की तपन फेल, आग की अगन फेल, बरफ़ी बयारों में भी अजब उबाल है।। बरफ़ पडे़ फर-फर, तन कंपे थर-थर, बरफ़ी बा…
शीत ऋतु का आगमन - कविता - आशीष कुमार
घिरा कोहरा घनघोर गिरी शबनमी ओस की बुँदे, बदन में होने लगी अविरत ठिठुरन। ओझल हुई आँखों से लालिमा सूर्य की, दुपहरी तक भी दुर्लभ हो रही प…
शिशिर ऋतु - कविता - शुचि गुप्ता
चुम्बन गगन करे धरा, वीणा मधुर बजी, मृदु धूप में निखर नहा, दुल्हन प्रभा सजी। बन मीत प्रेम ऋतु शिशिर, है पालकी लिए, शुभ आगमन अनंग रति, र…
शीत - कविता - नंदिनी लहेजा
हो रही शांत अब तपन धूप की, हवाएँ पंख फहरा रहीं। रवि को है जल्दी वापसी की, निशा, शशि संग इतरा रही। गई वर्षा अपने घर वापस, अब शीतऋतु की …
ठंडक के नज़ारे - कविता - शिवम् यादव "हरफनमौला"
धूप औ धुँध की चल रही थी कटी। धूप भी न हटी, धुँध भी न छटी।। अपना रुतबा दिखाने में सब व्यस्त थे, कुश्ती दोनों की लगभग बराबर कटी।। वो भी …
ठंड भी सुनती कहाँ - नज़्म - सुषमा दीक्षित शुक्ला
उफ़ ये कम्प लाती सर्द का, अलग अलग मिज़ाज है। बेबस ग़रीबो के लिए तो, बस सज़ा जैसा आज है। कुछ वाहहह वालों के लिए, तो मौज़ का आग़ाज़ है। कुछ के …
मैं क्या करूँ - गीत - राम प्रसाद आर्य "रमेश"
टिप-टिप बरसा पानी, पानी ने ठण्ड बढाई। आग जली घर-घर में, तो ओढी किसी ने रजाई। ठण्ड है, इस कदर, तन कंपे थर-थर, अब तुम ही बताओ बहन, …
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