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झारखण्ड के अमर शहीदों को जोहार : अमर शहीद तिलका माँझी - धारावाहिक आलेख - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
अमर शहीद तिलका माँझी जन्म - 11 फ़रवरी, 1750 मृत्यु - 13 जनवरी, 1785 तिलका माँझी का जन्म बिहार के सुल्तानगंज में तिलकपुर नामक गाँव में…
झारखण्ड के अमर शहीदों को जोहार : अमर शहीद रघुनाथ महतो - धारावाहिक आलेख - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
अमर शहीद रघुनाथ महतो जन्म - 21 मार्च, 1738 मृत्यु - 5 अप्रैल, 1778 तत्कालीन बंगाल के मानभूम अर्थात छोटानागपुर के जंगलमहल जिले के अंतर्…
छवि (भाग २०) - कविता - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
(२०) बौद्ध पंथ कहता है जग से, मानव मात्र समान है। बुद्ध बनो अंतस से मानव, दुख का यही निदान है।। हृदय-कलश में भर लो करुणा, प्रेम-दया सद…
छवि (भाग १९) - कविता - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
(१९) औरों को जीने दो सुख से, ख़ुद भी सुख पूर्वक जियो। पंथ यहूदी कहता जग से, ज्ञान-सुधा आसव पियो।। तोरा जीवन की पुस्तक है, यह जीवन आधार …
छवि (भाग १८) - कविता - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
(१८) पंथ पारसी कहे जगत से, अहुरमजदा अनंत हैं। आशा का क़ानून इन्हीं से, सत्य-धर्म सिद्धांत है।। चिन्ह अहुरमजदा का पावक, सर्वोच्च शक्तिमा…
छवि (भाग १७) - कविता - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
(१७) धर्म निभाया रामचंद्र ने, धारण कर के सत्य को। सत्य-शक्ति से मात दिलाया, दस ग्रीव असत्य को।। कर्तव्य-त्याग पालन कर के, रामराज्य काय…
छवि (भाग १६) - कविता - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
(१६) सूर्य एक है चंद्र एक है, धरती-अंबर एक है। मानव जाति एक हैं जग में, भिन्न विचार-विवेक हैं।। भिन्न-भिन्न हैं भाषा सबके, संस्कृतियाँ…
छवि (भाग १५) - कविता - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
(१५) हठवादिता-मोह-मद कारण, मानव के अपकर्ष का। मानव स्वयंमेव पथ चुनता है, विषाद या तो हर्ष का।। मंजिल एक सभी धर्मों की, अलग-अलग हर राह …
छवि (भाग १४) - कविता - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
(१४) 'धर्म' शब्द का सही अर्थ से, जन-मानव अनजान हैं। बहुसंख्यक हैं अज्ञानीजन, लघुसंख्यक को ज्ञान है।। धर्म किसे कहते हैं जानो, …
छवि (भाग १३) - कविता - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
(१३) वर्ष हज़ारों बीत गए अब, आया नूतन काल है। रहन-सहन मानव का बदला, बदल गई अब चाल है।। विविध धर्म और जातियों में, जीवात्मा गण बँट गए। ज…
छवि (भाग १२) - कविता - डॉ॰ ममता बनर्जी 'मंजरी'
(१२) हे पार्थ प्रतिम! तुम देख रहे जो, वही सत्य है जान लो। आश्चर्यचकित मत हो प्यारे, तत्व-ज्ञान संज्ञान लो।। परम् धाम मैं अखिल विश्व का…
छवि (भाग ११) - कविता - डॉ. ममता बनर्जी "मंजरी"
(११) दिव्य-चक्षु पाते ही अर्जुन, बरबस जड़वत हो गए। सीमा पार किए ज्ञानी की, दैव-जगत में खो गए।। परम रूपमैश्वर भगवन थे, सम्मुख पार्थ के ख…
छवि (भाग १०) - कविता - डॉ. ममता बनर्जी "मंजरी"
(१०) छवि देखता रहता मानव, मायावी संसार की। चर्म-चक्षु दिखलाता रहता, चीज़ें विविध प्रकार की।। ज्ञान-चक्षु यदि खोले मानव, दिख जाता कुछ और…
छवि (भाग ९) - कविता - डॉ. ममता बनर्जी "मंजरी"
(९) कर्मभूमि है धरती सारी, कर्ता मनुज महान है। प्रत्येक मनुज के उर तल में, शक्ति और शुचि ज्ञान है।। कर्त्यव्यों के निर्वाह हेतु, शैली …
छवि (भाग ८) - कविता - डॉ. ममता बनर्जी "मंजरी"
(८) छवि है अनुपम कर्मभूमि की, अवलोकन कर लो ज़रा। कर्मयोगियों से जगमग है, मनमोहिनी वसुंधरा।। योगी रत हैं योग-ध्यान में, भोगी रत आसक्ति म…
छवि (भाग ७) - कविता - डॉ. ममता बनर्जी "मंजरी"
(७) मानव योगी, मानव भोगी, मानव ईश समान हैं। मानव सज्जन-दुर्जन, हिंसक, मूरख अरु विद्वान हैं।। सामाजिक प्राणी है मानव, धार्मिक निष्ठावान…
छवि (भाग ६) - कविता - डॉ. ममता बनर्जी "मंजरी"
(६) मानव काया मोक्ष-द्वार है, परम साधनागार भी। जीवन दुखमय यही बनाए, करे यही उद्धार भी।। जीवन सुख-दुख का सम्मिश्रण, धूप-छाँव का खेल है।…
छवि (भाग ५) - कविता - डॉ. ममता बनर्जी "मंजरी"
(५) उगते-डूबते हुए सूरज, सतरंगी किरणें लिए। अंबर पे मुस्काता चंदा, मनमोहक सूरत लिए।। शीश उठाए पर्वत नाना, शीतल वायु मनोहरा। सुरभित पुष…
छवि (भाग ४) - कविता - डॉ. ममता बनर्जी "मंजरी"
(४) मनु-श्रद्धा महामिलन गाथा, शुचि कल्पना 'प्रसाद' की। प्रश्न भिन्न हैं प्रथम-पुरुष पर, किसने भू आबाद की? विविध धर्मग्रंथों का…
छवि (भाग ३) - कविता - डॉ. ममता बनर्जी "मंजरी"
(३) जब देवसृष्टि का नाश हुआ, जल प्रलय प्रबलतम मचा। जल मग्न धरा जन शून्य पड़ी, जीवित केवल मनु बचा। बनी संगिनी चिंता उसकी, उहापोह की थी घ…
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