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व्यथा - कविता - अलका ओझा
मन की भी अपनी व्यथा है कभी ख़ुशियों में ख़ुश नहीं होता कभी ग़म में दुःखी होने से मना करता है पर मन दुःख में व्यथित रहता है बिना आँसू बहा…
मन मर गया हो जैसे - कविता - शालिनी तिवारी
एक लड़की जो चहचहाती थी चिड़ियों-सी, अजीब-सी ख़ामोशी ओढ़े है। जिसे ज़िद थी भरी जवानी में बचपना जीने की, उसका बचपना एक ही ज़िंदगी में दो …
बेचैनी - कविता - अमित राज श्रीवास्तव 'अर्श'
यह बेचैनी क्या है? अधूरी आकांक्षा? या पूरी होने का भय? मन की इस बेकली का अंत कहाँ? शायद कहीं नहीं। शायद यही उसका स्वरूप है— एक निरंतर …
जंगली मन - कविता - सुनीता प्रशांत
इन हरे भरे जंगली पेड़ों जैसे मैं भी हरी भरी हो जाऊँ मनचाहा आकार ले लूँ कितनी भी बढ़ जाऊँ फैल जाऊँ दूर-दूर तक या आकाश को छू जाऊँ रोकना…
मन - कविता - इन्द्र प्रसाद
मन मधुर स्वप्न गाता है। वह राग मुझे भाता है॥ मन की गति सबसे न्यारी, है सब गतियों पर भारी। जब अंकुश हट जाता है, बन जाता अत्याचारी।…
द्वंद - कविता - पालिभा 'पालि'
कुछ घटनाएँ अक्सर छोड़ देती है, मन में कुछेक सवाल, ये सवाल ही छेड़ देती है मन में अक्सर द्वंद, ये द्वंद उथल-पुथल मचा देती है पैदा करके …
मन आज मेरा हारा हुआ जुआरी है - कविता - अतुल पाठक 'धैर्य'
मन आज मेरा हारा हुआ जुआरी है, मन जीता जिसने वह अनुपम छवि मनुहारी है। मुद्दतों बाद मन के आँगन में ख़ुशियों की प्यारी सी झलकारी है, जैसे …
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