संदेश
समर अभी रुका कहाँ - कविता - मयंक द्विवेदी
ये मंद-मंद जो द्वन्द्व है जो मन के मन में चल रहा समर अभी रुका कहाँ समर अभी रुका कहाँ भीतर झंझावतों का शोर है बाहर चुप्पियाँ है साध के …
धर्मयुद्ध - कविता - राजू वर्मा
क्या धर्मयुद्ध मजबूरी थी, हाँ धर्मयुद्ध मजबूरी थी, हाँ धर्मयुद्ध मजबूरी थी। अर्जुन ने भी यह सोचा होगा, कई बार मन को रोका होगा, पर कौरव…
युद्ध का औचित्य - कविता - गिरेन्द्र सिंह भदौरिया 'प्राण'
जब भ्रम ही सच्चा लगता हो, तब सत के पथ पर कौन चले। जब द्वार खड़े हों वायुयान, घोड़ों के रथ पर कौन चले॥ तिलमिला उठे जब बर्बरता, कुलबुला …
पार्थ - कविता - राकेश कुशवाहा राही
या तो युद्ध करो तुम या फिर हँसी सहो अपनो की, तज कर मोह संहार करो तुम अभी सभी अपनो की। जीकर तुम यथार्थ में मत बात करो मरे सपनो की, आने …
युद्ध और सफ़ेद फूल - कविता - मयंक मिश्र
सफ़ेद फूल! वही सफ़ेद फूल, जो शांति का प्रतीक है; सफ़ेद फूल तो आ गए! लेकिन, उससे पहले; दुनिया में होनी थी शांति! हुआ क्या? युद्ध! बुद्ध …
भीम दुर्योधन युद्ध - कविता - जितेंद्र रघुवंशी 'चाँद'
ललकारा जब भीम को दुर्योधन ने। साधा बाण फिर अर्जुन ने। पर, उसी क्षण रोक लिया, भीम ने, कहा, इसके लिए मैं ही काफ़ी हूँ। क्षमा करे भ्राता, …
लड़कर क्या मिलेगा? - कविता - चंदन कुमार 'अभी'
यह हमारा है वह तुम्हारा, कहकर क्या मिलेगा? एक दूसरे की ताक़त बनों, आपस में लड़कर क्या मिलेगा? समाधान नहीं है रण इसका, रणभूमि में उतड़कर क…
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