संदेश
संध्यावंदन - लघुकथा - ईशांत त्रिपाठी
"बहुत ही बकवास! दिमाग़ से पैदल है क्या एंकर, एक ही बात को बार बार दोहराता है। मुझे एच॰ओ॰डी॰ का फ़ोन नहीं आता तो यहाँ महत्वपूर्ण यज्…
समझाइश - बघेली लघुकथा - ईशांत त्रिपाठी
मौसी केर बियाह के उराओ म परदेस म पढ़त दीनू चार रोज़ पाछेन आइगा। चार रोज़ आगे बियाह होय का हबै पर दीनू का रौनक नहीं देखान। ओसे रहा नहीं ग…
ड्यूटी की ब्यूटी - लघुकथा - प्रमोद कुमार
पिछले चुनाव का यात्रा वृतांत सुनकर ही मिश्रा जी ने इस बार संपन्न होनेवाले पंचायत चुनाव में पिताजी का नाम चुनाव ड्यूटी से हटवाने का फ़ैस…
क्या वह दोषी है? - लघुकथा - डॉ॰ सुनीता श्रीवास्तव
“अब जाकर घर आ रही हैं…!! तुम्हारे कारण माॅं चल बसी, एक भी फ़ोन नहीं उठाया तुमने?”- उत्तम (राशि का पति) भरी भीड़ में सबके सामने राशि पर …
कब तक? - लघुकथा - ईशांत त्रिपाठी
तुम रो रहे हो कुशाग्र! पर किसलिए? अकेले यूँ रोना अच्छा नहीं, यह करके तुम मेरे साथ भी धोखा कर रहे हो। कुशाग्र कुन्दन को आश्चर्य भरी नज़…
स्वाद मर जाता है - लघुकथा - ईशांत त्रिपाठी
"फुल्की खा रही हूँ, बाद में करती हूँ बेटा फ़ोन! तुम भी खा लो कहीं" ऐसा कहते हुए समीर की माँ समीर का फ़ोन रख देतीं हैं।समीर को …
नायाब भिक्षुक - लघुकथा - ईशांत त्रिपाठी
विद्यालय से पढ़ाकर घर लौटते समय अपने साथी आचार्य दीनू महोदय की सहमति चाहते हुए आचार्य पंकज ठहाके लगाते हैं और कहते हैं कि बच्चों को पढ…
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