संदेश
निशा - कविता - मयंक द्विवेदी
चाँद की चंचल किरणों में ये रैन कुछ नया बुन रही समझो मन्द-मन्द ही सही पर ये रात आगे बढ़ रही। रैन में सब थमा पर धड़कने तो चल रही कुछ आस …
भोर - कविता - गिरेन्द्र सिंह भदौरिया 'प्राण'
मुर्गे बाँग दे उठे तन कर, होने लगी विदाई तम की। मन्दस्मित मुस्कान उषा की, गगन भेदती झिलमिल चमकी॥ पूर्व दिशा से भुवन भास्कर, धीरे-धीर…
सुबह - कविता - संजय राजभर 'समित'
सूरज का नियति समय पर उदय होना सुबह नहीं है यह एक प्राकृतिक चक्र है और कुछ नहीं, सुबह मानवतावादी होना और अच्छे संस्कारों का बीजारोपण…
उषा - कविता - गोलेन्द्र पटेल
प्रात पुष्प था बहुत खिला हुआ जैसे लोहित आसमान का सूरज पृथ्वी पर उतर रहा हो (नदी सागर की यात्रा में नई सुबह है) बहुत धुआँ उठ रहा है उध…
नवभोर - कविता - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
नवभोर नमन मंगलमय जन, खिले चमन नव प्रगति सुमन। पथ नवल सोच नवशोध सुयश, नवयुवा देश हित भक्ति किरण। कर्म कुशल युवा जन मन भारत, सच्चरि…
चल कर आती है भोर - गीत - डॉ॰ सुमन सुरभि
शबनम में भीगे से फूलों की शाखों पर रंग बिखराती तितलियों के पाँखों पर बुझे हुए दीपों के कृष्णकाय ताखों पर कजरारी अलसाई अधखुली आँखों …
सुबह का मुख - कविता - कर्मवीर सिरोवा 'क्रश'
जनवरी की ये भीगी-भीगी शबनमी सहर, ये कड़कड़ाता, ठिठुराता और लुभाता मौसम, ये बहती सर्द और पैनी हवाओं की चुभन, इस पर तिरा ज़िक्र-ए-जमील, ज़ेह…
प्रातः पूस की - कविता - अनूप मिश्रा 'अनुभव'
पूष की प्रातः आभा को, ढक दी श्यामल मेघ की चादर। खेल रहे रजनी संग जैसे, आँख मिचोली खेल प्रभाकर। संध्या की सारी को पहने, डाले भोर भरम …
प्रकृति का अनोखा अवतार - कविता - प्रतिभा नायक
भोर भई भानु चढ़ आए नीले अनन्त आकाश पर सूर्य की ललित लालिमा प्रभात गीत गाए गगन पर। चढ़े सूरज सीस पर धूप चुभती चटक सूई सी शूल समान दिनकर…
अरुणिम उषा है खिली-खिली - गीत - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
पंखुड़ियों में सिमटी कलियाँ, अरुणिमा उषा है खिली-खिली। मुस्कान सुरभि यौवनागमन, मधुपर्क मधुर नव प्रीति मिली। श्री प्रभा उषा विलसित…
सुबह हो रही है - कविता - सुरेन्द्र प्रजापति
उठो! मेरे आत्मा के सूरज सुबह हो रही है तरु शिखाओं की ऊपरी फुनगियों पर, उतर रही है- उजले सूरज की चंचल धूप कोमल दल पर किरनें, दुब पर टँग…
नई सुबह - कविता - ऋचा तिवारी
ये ज़िंदगी की बात है, तू आज क्यूँ उदास है। क़दम तेरे जो बढ़ चले, तो शोक कैसा आज है। ये वक़्त की ही बात है, काली अँधेरी रात है। ये रात बीत…
स्फूर्ती - आलेख - निशांत सक्सेना "आहान"
हर बार जब आप जागते हैं तो आप एक अलग व्यक्ति होते हैं। नए दिनकर के साथ शरीर स्फूर्ति से परिपूर्ण होता हैं। आलस्य भी विभावरी के साथ उड़नछ…
सुहानी सुबह - बाल कविता - डॉ. कमलेंद्र कुमार श्रीवास्तव
नवल प्रात की नई किरण ने, छटा विकट फहराई, दूर हो गया तम तुरंत ही, नई सुबह है आईं। नन्ही नन्ही चिड़ियाँ चहकीं, और चहकते बच्चे, चीं-चीं कर…
सहर - गीत - रमाकांत सोनी
सहर से लेकर शाम तक, गोकुल वृंदावन धाम तक। मुरली मोहन मधुर सुनाते, प्यारी माधव की है झलक।। रवि रथ आया सहर में, नव उर्जा लाया पहर में। अ…
प्रात बेला - कविता - आलोक कौशिक
लालिमा का अवतरण है, रोशनी का आवरण है। भोर आई सुखद बनकर, सूर्य का यह संचरण है। प्रकृति का आलस्य टूटा, तमस भागा और रुठा। हो गई धरती सुहा…
प्रभात दर्शन - कविता - कवि कुमार प्रिंस रस्तोगी
नया सवेरा उठकर देखो कैसा प्रभात वो होता है, रोज़ नई उम्मीदों मे वो प्रभात फिर खिलता है, माना दिन बदला बादल न आए पर युग बदला बादल भी …
नव जीवन की चिड़िया - कविता - मयंक कर्दम
सुबह-सुबह सूर्य के स्वागत में, गाना-गाते, उछल कूद कर रही है। ये नाच-नाचकर देखो बच्चों, अपने पंख फैला रही हैं। एक तरफ़ गाना गाती, तो…
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