संदेश
है नारी हर युग में युग निर्माता - कविता - महेन्द्र सिंह कटारिया
ममत्व भाव पाने को जिसका, सदैव आतुर रहे स्वयं विधाता। शील, शक्ति, सौंदर्य समन्विता, है नारी हर युग में युग निर्माता। स्नेह सुधा बरसा कर…
नवयुग की हम नारी - कविता - प्रमोद कुमार
नव प्रभात अब निकल गया है, कटी रात अंधियारी, अब इतिहास बदलेंगे मिलकर, नवयुग की हम नारी। कालरात्रि दुर्गा बनकर हमने असुरों को मारा, चामु…
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस - कविता - डॉ॰ राम कुमार झा 'निकुंज'
वह संघर्ष से सफलता तक, अद्भुत विधान दर्शाती है। नारी का सम्मान ही जीवन, पौरुषता पथ ले जाती है। सोपानों को चढ़ती नारी, कीर्ति पताका लहर…
बिखरे पन्ने - कविता - ऋचा तिवारी
सदियों से होता आया था, आगे भी होता जाएगा। उस युग में तो कान्हा तुम थे, इस युग में कौन बचाएगा॥ प्रतिबिंब बना उस देवी की, उस पल में क्या…
मजबूर-सी औरत - कविता - दिलीप कुमार चौहान 'बाग़ी'
पीठ पर बाँधकर दुपट्टे से सुला रही थी अपने दुधमुँहे बच्चे को अपने नर्म हाथों से थपथपाकर मानों धरती को जगा रही थी। मिट्टी को पसीने से सा…
मन मर गया हो जैसे - कविता - शालिनी तिवारी
एक लड़की जो चहचहाती थी चिड़ियों-सी, अजीब-सी ख़ामोशी ओढ़े है। जिसे ज़िद थी भरी जवानी में बचपना जीने की, उसका बचपना एक ही ज़िंदगी में दो …
मैं स्त्री हूँ - कविता - प्राची अग्रवाल
जानती हूँ मैं अपनी मर्यादा हर वक्त मुझे मत टोको। मर्यादा लाँघने वाली स्त्रियाँ अलग होती है। मुझे उनके साथ मत तोलो। भाषा हूँ मैं मौन की…
स्त्रीत्व - कविता - आलोक गोयल
देवी बनने की चाह नहीं नारी ही मुझको रहने दो, बाँधों से मत रोको अब स्वच्छंद नदी-सी बहने दो। मैं पूजा की वस्तु नहीं इतना भी अभिमान ना द…
स्त्री - कविता - संजय राजभर 'समित'
स्त्री एक आनंद है सकल ब्रह्मांड है तो एक गंभीर, अथक पथिक भी है जो सत्य की खोज में एक अदम्य साहस के साथ अकेले सूनसान! ज़िंदगी की ऊबड़-ख…
मैं नारी हूँ - गीत - उमेश यादव
मैं नारी हूँ, मैं शक्ति हूँ , मैं देवी हूँ, अवतारी हूँ। अबला कभी समझ मत लेना, ज्वाला हूँ, चिंगारी हूँ॥ कल्याणी, भवानी, सीता भी मैं, …
नारी - कविता - सूर्य प्रकाश शर्मा
ईश्वर की अनुपम, अद्भुत कृति, हे सावित्री! सीता, हे सती! हो रानी लक्ष्मी बाई तुम, काली बनकर के आई तुम॥ परहित करने वाली देवी, वीरों…
देहाती स्त्रियाँ - कविता - विक्रांत कुमार
रात और दिन का क्षण पाय-पाय रेजकी का संग्रहण घर-गृहस्थी की गुमकी पसीने से तर-बतर हौसला गृहस्थ आमद और खाता-बही देहती स्त्रियाँ सबको…
औरत - कविता - डॉ॰ आलोक चांटिया
बड़ी अजीब सी बात है कि उसके जीवन में आज भी वैसी ही रात है कहते तो यह भी है कि वह जैसे चाहे जी सकती है जहाँ चाहे रह सकती है अब आसम…
गांधी जी और स्वतंत्र भारत की स्त्री - लेख - सुनीता भट्ट पैन्यूली
गांधी जी का जीवन-दर्शन आश्रय स्थल है उन जीवन मूल्यों और विचारों का जहाँ श्रम है, सादगी है सदाचार है, आत्मसम्मान है, सत्य है, अहिंसा है…
स्त्री-पुरुष दोनों की भूमिका अलग - कविता - नौशीन परवीन
बहुत सी लेखिकाएँ स्त्रियों की जीवन गाथा लिख रही है हर स्त्रियों की अपनी कहानी होती है। मध्यम वर्ग की स्त्री पुरुषों की पकड़ से स्व…
कच्ची मिट्टी - कविता - कुमुद शर्मा 'काशवी'
कच्ची मिट्टी सी मैं, सबके रंग में रंग जाऊँ, ढाल ख़ुद को...! अपनो की ख़ुशियों में, मन ही मन सुकून पाऊँ, हर रिश्ते के साँचे में, ढाल ख़ुद …
नारी - कविता - रमेश चंद्र वाजपेयी
नारी है तो जग है, नारी है तो जीवन का सुंदरतम मग है। अबला नहीं हो तुम तुम तो हो सबला, बचपन में माँ-बाप का खिलौना और आँगन में जैसे तु…
तुझसे है यह जीवन सारा - कविता - जयप्रकाश 'जय बाबू'
तुझसे है यह जीवन सारा, लोक, धरा ये गगन अपारा, तुमसे है ख़ुशियाँ और प्यार तुमसे ही है ये घर परिवार, बच्चों के कोमल बचपन सी मुस्काती हर्ष…
नारी - दोहा छंद - भाऊराव महंत
रोक सको तो रोक लो, नारी की रफ़्तार। अब पहले जैसी नहीं, वह अबला लाचार॥ जब नारी चुपचाप थी, दिखता था संस्कार। बदतमीज़ लगने लगी, बोली जिस दि…
प्रश्न नहीं, परिभाषा बदलनी होगी - कविता - अपराजितापरम
चाहती हूँ, उकेरना, औरत के समग्र रूप को, इस असीमित आकाश में...! जिसके विशाल हृदय में जज़्बातों का अथाह सागर, जैसे- संपूर्ण सृष्टि की भाव…
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